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क्या हम वास्तव में जैन है? ...या कुछ और ?

बहुत वर्षों पहले की बात है.
मैं और कुछ मित्र तीर्थ यात्रा पे निकले थे और वहां पहुंचते पहुंचते देर रात हो गई थी. कमरे के लिए पूछते ही धर्मशाला के मैनेजर ने कार्यवाही शुरू की-
“कौन है - कहाँ से आये हैं - कितने दिन रुकेंगे - आप जैन है या नहीं” आदि.
वहाँ तक सब ठीक था.
फिर अचानक सवाल आया – “आप कौनसे पंथी हो?
मेरे कान खड़े हो गए - ये कैसा सवाल था?
मैंने पूछा - “कौनसे पंथी मतलब?”
तब उन्होंने थोडे विस्तार से पूछा – “कौन से पंथ के हो - श्वेतांबर या दिगंबर?”
मैंने कहा – ‘श्वेतांबर’ - और साथ-साथ मैने भी एक सवाल जड़ दिया –“क्यों ऐसा पूछ रहे हो ?
तो उन्होंने जवाब दिया – “फॉर्म में सब लिखना पड़ता है. सभी पंथ के लोग उतरते है यहाँ.”
मैंने सोचा, चलो ठीक है.
मुझे लगा के पूछताछ ख़त्म हो गई तभी सामने से और एक सवाल आया - "मंदिर-मार्गी (मूर्तिपूजक) हो ना?"
मैंने जवाब दिया - 'हां'. तुरंत एक और सवाल आया – “तपागच्छ के हो या खरतरगच्छ के?”
मैने गुस्से में कह दिया - "आपको मतलब? क्या यह भी फॉर्म में लिखना है?"
तो उन्होंने हस्ते हस्ते कहा - "नहीं-नहीं, मुझे तो बस जानना था के आप …

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