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जिन पूजा: इतिहास के पन्नो से

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A. प्रस्तावना पूजा विधान प्रत्येक उपासना पद्धति का एक अनिवार्य अंग है. जहां पूजा विधान, उपासना पद्धति का शरीर है, आध्यात्म साधना उसका प्राण है. भारतीय धर्मो में प्राचीनकाल से ये दोनों प्रकार की प्रवृत्तियाँ स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है. इस संसार के प्रत्येक जिव का लक्ष्य है की सांसारिक दुःखो एवं परिभ्रमण से मुक्ति पा कर शाश्वत सुख को उपलब्ध करना. पूर्वाचार्यों ने मोक्ष की साधना का सरल एवं सुलभ मार्ग तीर्थंकर परमात्मा का दर्शन-पूजन एवं भाव पूर्ण भक्ति बताया है. वर्त्तमान काल में जब साक्षात परमात्मा का आभाव है तब मात्र परमात्म भक्ति और उनकी वाणी पर श्रद्धा ही हमारे मुक्ति का आधार बन सकती है. परिणाम विशुद्धि के लिए शुभाशुभ ध्यान की दृष्टि से जिनप्रतिमा और जिनपूजन स्वच्छ दर्पण के सामान है; पूजनीय के गुण ग्रहण को ही पूजा का सम्यक अर्थ माना जा सकता है. जैन परंपरा में जिन पूजा के जो विविध रूप बताए गए उन सबका मुख्य लक्ष्य इतना ही है की व्यक्ति अपने अंतर में रहने वाले निहित परमात्म तत्व को पहचाने . यद्यपि निर्गुणोपासना या भावाराधना एक उच्च स्थिति है, पर आज के युग में यह मात्र कुछ ही महान