जिन पूजा: इतिहास के पन्नो से



A. प्रस्तावना

पूजा विधान प्रत्येक उपासना पद्धति का एक अनिवार्य अंग है. जहां पूजा विधान, उपासना पद्धति का शरीर है, आध्यात्म साधना उसका प्राण है. भारतीय धर्मो में प्राचीनकाल से ये दोनों प्रकार की प्रवृत्तियाँ स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है. इस संसार के प्रत्येक जिव का लक्ष्य है की सांसारिक दुःखो एवं परिभ्रमण से मुक्ति पा कर शाश्वत सुख को उपलब्ध करना. पूर्वाचार्यों ने मोक्ष की साधना का सरल एवं सुलभ मार्ग तीर्थंकर परमात्मा का दर्शन-पूजन एवं भाव पूर्ण भक्ति बताया है. वर्त्तमान काल में जब साक्षात परमात्मा का आभाव है तब मात्र परमात्म भक्ति और उनकी वाणी पर श्रद्धा ही हमारे मुक्ति का आधार बन सकती है.

परिणाम विशुद्धि के लिए शुभाशुभ ध्यान की दृष्टि से जिनप्रतिमा और जिनपूजन स्वच्छ दर्पण के सामान है; पूजनीय के गुण ग्रहण को ही पूजा का सम्यक अर्थ माना जा सकता है. जैन परंपरा में जिन पूजा के जो विविध रूप बताए गए उन सबका मुख्य लक्ष्य इतना ही है की व्यक्ति अपने अंतर में रहने वाले निहित परमात्म तत्व को पहचाने. यद्यपि निर्गुणोपासना या भावाराधना एक उच्च स्थिति है, पर आज के युग में यह मात्र कुछ ही महानुभावों के लिए संभव है. आलम्बन बिना आराधना करना एक सामान्य श्रावक/ श्राविका के लिए काफी कठिन है. मूर्तिपूजा की आवश्यकता प्राथमिक स्तर पे उसी प्रकार है जिस प्रकार वर्णमाला का अर्थ समझने के लिए चित्रों की सहायता जरुरी है.

श्री अरिहंत प्रभु की पूजा, द्रव्य और भाव द्वारा दो प्रकार से की जाती है. यद्यपि द्रव्य-भाव एक दूसरे से सम्बंधित है फिर भी प्रधान गौण भाव से दोनों भिन्न है. प्रथम पूजा में द्रव्य की प्रधानता है और दूसरी पूजा में भाव प्रधान हो जाता है.

यह लेख जैन श्वेताम्बर सम्प्रदाय में द्रव्य पूजा की उज्जवल परंपरा और उसकी विकास यात्रा को दर्शाने का एक प्रयास है. श्वेताम्बर सम्प्रदाय में द्रव्य पूजा विधि के पीछे रहे उद्देश्य और भाव इस लेख का विषय नहीं है. दिगंबर संप्रदाय के अंतर्गत द्रव्य पूजा विधि का भी इस लेख में समावेश नहीं किया गया है. श्वेताम्बर सम्प्रदाय की द्रव्य पूजा विधि को समझने के लिए हमने दो काल में इस विषय को बांटा है जिसकी हम विस्तार में चर्चा करने का प्रयास करेंगे:

१. पूर्वकाल - ईस्वी की पांचवी शताब्दी के पूर्व
२. मध्य और अर्वाचीनकाल - ईस्वी की पांचवी शताब्दी से अब तक.

इस सम्पूर्ण अनुसंधान में श्री पारसभाई शाह (मुंबई), श्री मिहिरभाई वखारिया(अहमदाबाद) और श्री सौरभभाई मेहता (कोलकाता) ने अपनी अमूल्य तस्वीरें प्रदान करके इस लेख की शोभा बढ़ाई है. 


केसर मिश्रित जल द्वारा अभिषेक (तस्वीर: श्री मिहिरभाई वखारिया)


B. पूर्वकाल में द्रव्य पूजा

1. आगमो में जिन प्रतिमा के द्रव्य पूजन के उल्लेख

जिन प्रतिमा के द्रव्य पूजन के सर्वाधिक प्राचीन उल्लेख हमें गणधर भगवंत रचित अंग-आगमो में पाए जाते हैं. गणधर श्री सुधर्मा स्वामी द्वारा रचित छठे अंग आगम श्री नायाधम्मकहाओ (श्री ज्ञाताधर्मकथा सूत्र) के प्रथम श्रुतस्कंध के १६वे अध्ययन में हमें द्रौपदी द्वारा जिन प्रतिमा पूजन का निम्नलिखित उल्लेख प्राप्त होता है –

तए णं सा दोवई रायवरकन्ना जेणेव मज्जणघरे तेणेव उवागच्छई मज्जणघरं अणुपविसई त्ता ण्हाए कायबलिकम्मा कयकोउयमंगल पायच्छित्ता सुद्धप्पावेसाइं मंगल्लाइं वत्थाइं पवरपरिहिया जिणपडिमाणं अच्चणं करेइ त्ता जेणेव अंतेउरे तेणेव उवा उवागच्छइ।[1]

अर्थात - उत्तम राजकन्या द्रौपदी यथासमय स्नान घर की ओर गई और वहां जा कर स्नान गृह में प्रविष्ट हो कर स्नान किया; यावत् शुद्ध एवं मांगलिक वस्त्र धारण किए, जिनप्रतिमा की अर्चना की, जिसके पश्चात वह अन्त: पुर में चली गई.[2] 

मूल सूत्र की इस गाथा से हमें यह तो पता चलता है की द्रौपदी ने जिन पूजा की, परन्तु किस विधि से या किन द्रव्यों से पूजा की इसका विवरण हमें ईस्वी की १०वी सदी में आचार्य श्री अभयदेवसूरि द्वारा रचित श्री ज्ञाताधर्मकथा सूत्र की वृत्ति से पता चलता है[3] जिसमे आचार्यश्री फरमाते हैं की - द्रौपदी मज्जन गृह (स्नान गृह) से निकल कर जिनमंदिर आती है. जिनगृह में प्रवेश कर (प्रभु प्रतिमा को) मोरपीछ से प्रमार्जन करती है और उसके पश्चात जिस तरह सूर्याभ देवने प्रतिमा पूजन किया था उसी तरह सत्तर प्रकार से पूजा की. धुप कर के बायां घुटना ऊँचा रखके नमोत्थुणं अरिहंताणं का पाठ किया[4].

श्रुतकेवली पूर्वाचार्यों द्वारा रचित, दूसरे उपांग आगम श्री रायपसेणीय सूत्र (श्री राजप्रश्नीय सूत्र) में सूर्याभ देव द्वारा सिद्धायतन में बिराजित जिनप्रतिमा पूजन का निम्नलिखित विस्तृत उल्लेख प्राप्त होता है-

..तए णं से सूरियाभे देवे चउहिं सामाणियसाहस्सीहिं जाव सोलस आयरक्खदेवसाहस्सीहिं अण्णेहिं बहूहि य सूरियाभविमाणवासीहिं वेमाणिएहिं देवीहि य सिद्धिं संपारिवुडे सव्विड्ढीए जाव णाइयरवेणं जेणेव सिद्धायतणे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता सिद्धायतणं पुरत्थिमिल्लेणं दारेणं अणुपविसइ, अणुपविसित्ता जेणेव देवच्छंद जेणेव जिणपडिमाओ तेणेव उवागच्छइ उवागच्छित्ता जिणपडिमाणं आलोए पणामं करेइ, करेत्ता लोमहत्थगं गिण्हइ गिण्हि त्ता जिणपडिमाणं लोमहत्थएणं पमज्जइ, पमज्जित्ता जिणपडिमाओ सुरभिणा गंधोदएणं ण्हाएइ, ण्हाइत्ता सुरभिकासाइएणं वत्थेणं गायाइ लुहेइ लूहित्ता सरसेणं गोसीसचंदणेणं गायाइं अणुलिंपइ, अणुलिंपइत्ता, जिणपडिमाणं अहयाइं देवदूसजुयलाइं नियंसेइ, नियंसेत्ता अग्गेहिं वरहिं गंधेहिं मल्लेहि य अच्चेइ, अच्चेता पुप्फारुहणं मल्लारुहणं वण्णारुहणं चुण्णारुहणं गंधारुहणं आभरारुहणं करेइ, करेत्ता आसत्तोसत्त-विउल-वट्ट-वग्घारिय-मल्लदामकलावं करेइ, करेत्ता कयग्गहगहियकरयलपब्भट्ठ-विप्पमुक्केणं दसद्धवण्णेणं कुसुमेणं पुप्फपुंजों वयारकलियं करेइ करेत्ता जिणपडिमाणं पुरओ अच्छेहिं सण्हेहिं रययामएहिं अच्छरसा-तंदुलेहिं अट्ठट्ठ मंगले आलिहइ, तं जहा - सोत्थिय जाव दप्पणं।
तयाणंतरं च णं चंदप्पभ-वइरवेरुलिय-विमलदंडं कंचणमणियरणभत्तिचितं कालागुरु पवरकंदुरुक्क-तुरुक्क धूव-मघमघेंत-गंधुत्तमाणुविद्धं च धूववट्टिं विणिम्मुयंत वेरुलियमयं कडुच्छयं पग्गहिय पयत्तेणं धूवं दाऊण;…
[5]

"...उसके पश्चात ४००० सामानिक देव यावत् १६००० आत्मरक्षक देव और सूर्याभ विमान निवासी अन्य देव-देवियों के साथ सूर्याभ देव अपनी सर्वऋद्धि यावत् वाजिंत्रो के ध्वनिपूर्वक के साथ सिद्धायतन के पूर्व द्वार से प्रवेश करते है. जहाँ देवच्छंदक के ऊपर जिनप्रतिमाएँ स्थित है वहां आते है. जिनप्रतिमा को देख के प्रणाम करते है और जिनप्रतिमा को लोमहस्तक (मोरपींछ) से प्रमार्जन करते है. प्रमार्जन कर के जिनप्रतिमा को सुगंधी गंधोदक से नहलाते है और सुगंधी लाल वस्त्र से जिनप्रतिमा को पोंछ कर उत्तम गोशीर्ष चन्दन (गोशीर्ष पर्वत से प्राप्त चन्दन) से जिनप्रतिमा का लिंपन (विलेपन) करते है. लिंपन कर के जिनप्रतिमा को सुगंधी गंध कषायिक से गात्रो (अंगो) को पोंछ कर अखंडित देवदुष्य-युगल पहनाते है. उसके बाद जिनप्रतिमा को पुष्पमाला, गंध, चूर्ण, वर्ण, वस्त्र और आभरण (आभूषण) चढ़ाते हैं. फिर निचे तक लटकती लम्बी लम्बी गोल माला पहनाते है और पंचवर्णी पुष्पपुंज को हाथ में ले कर पुष्पवर्षा करके प्रभु मंडप को शुशोभित करते है. फिर जिनप्रतिमा के समक्ष स्वच्छ स्निग्ध रजतमय अक्षततंदुल से स्वस्तिक से ले कर दर्पण युक्त अष्टमंगल का आलेखन करते है. उसके बाद (सूर्याभ देव) चंद्रकांत मणि, वज्र रत्न और वैडूर्यमणि दंड युक्त, स्वर्ण मणि और रत्नजड़ित अद्भुत रचना वाली धुपदानी ग्रहण कर श्रेष्ठ कालागुरु (अगर), कुंदूरुष्क (चीड़), और तुरुष्क (लोबान) आदि के मघमघते उत्तम गंध युक्त धुप से धूपक्षेप करते है..."[6] 

 श्रुतकेवली पूर्वाचार्यों द्वारा रचित, तीसरे उपांग आगम श्री जिवाभिगम सूत्र में विजय देव द्वारा की गई जिन पूजा का भी समरूप उल्लेख प्राप्त होता है[7] इसीलिए यहाँ प्रस्तुत नहीं किया गया है.

इन तीनो उल्लेखों से हमें यह पता चलता है की द्रौपदी, सूर्याभ देव और विजय देव ने १७ प्रकार से जिनपूजन किया- (१) प्रमार्जन, (२) गंधोदक अभिषेक, (३) चन्दन विलेपन, (४) गात्र लूंछन, (५) देवदुष्य अर्पण, (६) पुष्प, (७) पुष्पमाला, (८) गंध, (९) चूर्ण, (१०) वर्ण, (११) वस्त्र, (१२) आभरण, (१३) पुष्पघर, (१४) पुष्पवर्षा, (१५) अष्टमंगल आलेखन, (१६) धुप और (१७) स्तुतिगान. यहाँ उल्लेखनीय है की वर्तमान में प्रचलित नवांगी तिलक पूजा, दीपक पूजा, नैवेद्य पूजा और फल पूजा का वर्णन नहीं है. यह १७ प्रकार की पूजा आगे चल के वर्त्तमान में सत्रहभेदी पूजा का मूलाधार बनी जिसकी विस्तृत चर्चा हम आगे करेंगे. यह १७ प्रकारी सामान्य श्रावको के लिए रोजिंदा संभव नहीं थी, और मात्र विशिष्ठ अनुष्ठानो पे यह पूजा होती थी या विशेष ऋद्धिमान श्रावक इसे करते थे.

लोमहस्तक (मोरपींछ) द्वारा प्रभु प्रतिमा का प्रमार्जन (तस्वीर: श्री पारसभाई शाह)


एक और पूजा पद्धति हमें आगम छेदसूत्र श्री महानिशीथ सूत्र के चतुर्थ अध्ययन में प्राप्त होती है. लगभग ईस्वी की पहली से पांचवी शताब्दी के बिच में रचित[8], इस सूत्र में द्रव्य पूजन का निम्नलिखित वर्णन प्राप्त होता है– 

जहा-किल 'अम्हे अरहंताणं भगवंताणं गंध-मल्ल-पदीव-सम्मज्जणोवलेवण-विचित-वत्थ-बलि-धुयाइ-तेहिं पूया-सक्कारेहिं अणुदियहमब्भच्चणं पकुव्वाणा तित्थुच्छप्पणं करेमो[9]

अर्थात -हम अरिहंत भगवंत की (१) गन्ध (सुगन्धि पदार्थ - वासचूर्ण आदि), (२) माला (पुष्प माला), (३) दीपक, (४) संमार्जन (जल अभिषेक), (५) लिंपन (विलेपन), (६) वस्त्र, (७) बलि (नैवेद्य), (८) धुप की पूजा सत्कार करके हंमेशा तीर्थ की प्रभावना करते हैं[10]. इस विधि में केसर द्वारा नवांगी तिलक पूजा, अक्षत पूजा और फल पूजा का उल्लेख नहीं है.

श्री आवश्यक भाष्य में वर्णित जिनपूजा अधिकार के अंतर्गत भाष्यकार अनेक द्रव्यों से विलेपन, आभरण और अक्षत, नैवेद्य, फल पूजा का वर्णन करते हैं –

कप्पूरमलयजेहिं, कत्थुरिय कुंकुमाइ दव्वेहिं। जिणबिम्बसमालभणं, करेज्ज भत्तीए परमाए।।
विहवाणुसारि जो पूण, पूयं विरएज्ज सुरहिकुसुमेहिं। कंचण-मोत्तिय-रयणाई, दामएहिं च विविहेहिं।।
सिद्धत्थयदहियक्खय खज्जग-वरलड्डूगाइदव्वेहिं। अंबगमाइफलेहिं य, विरएज्ज बलिं सुसंविग्गो।।
[11]

अर्थात्, कपूर, चन्दन, कस्तूरी, कुंकुम (केसर) आदि द्रव्यों से जिनबिम्ब (जिनप्रतिमा) का विलेपन करना चाहिए और विभवानुसार यदि पूजा करें तो सुगन्धित पुष्पों से अथवा सुवर्ण, मोती, रत्न आदि विविध प्रकार की मालाओं से करनी चाहिए. सिद्धार्थक (सफेद सरसों), दही, अक्षत, खाजे, उत्तम लड्डू आदि द्रव्यों से तथा आम आदि सुपक्व फलों सहित संविग्न भावयुक्त हो कर नैवेद्य चढाने चाहिए[12]. इस विधि में अभिषेक, नवांगी तिलक पूजा, धुप एवं दीपक पूजा का उल्लेख नहीं है.

इन सभी उल्लेखों के अलावा श्री भगवती सूत्र (तुंगिया नगरी के श्रावकों द्वारा जिनपूजा), श्री उपासकदशा सूत्र (आनंद आदि श्रावकों द्वारा जिनप्रतिमा को वंदन-पूजन), श्री जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र (यमक आदि देवों द्वारा २६९ शाश्वत पर्वतों पर जिनपूजा), श्री आवश्यक सूत्र (प्रभावती द्वारा त्रिकाल पूजा, श्रेणिक राजा द्वारा १०८ सोने के जवों से जिनप्रतिमा पूजा), श्री महाकल्पसूत्र (जिनप्रतिमा की त्रिकाल पूजा), श्री सूत्रकृतांग निर्युक्ति (आद्रकुमार द्वारा जिनप्रतिमा पूजन), श्री आवश्यक निर्युक्ति (पुष्पादि द्वारा द्रव्य पूजा), श्री जितकल्पभाष्य (तीर्थंकर प्रतिमा की पुष्पादि पूजा) आदि अनेक अंग-उपांग सूत्रों में द्रव्य जिन पूजा का उल्लेख प्राप्त होता है, पर द्रव्यों का विस्तृत विवरण प्राप्त नहीं होता[13].

प्रभु का दूध आदि द्रव्य (पंचामृत) द्वारा अभिषेक (तस्वीर: श्री मिहिरभाई वखारिया) 


2. स्नानोत्सव और दूध आदि द्रव्यों से अभिषेक

ईस्वी की तीसरी शताब्दी[14] में आचार्य श्री विमलसूरि द्वारा रचित पउमचरियं में दूध आदि द्रव्यों द्वारा प्रभुप्रतिमा के अभिषेक का निम्नलिखित वर्णन प्राप्त होता है जो आगमो के उल्लेखों में नहीं मिलता-

दारेसु पुण्ण कलसा; ठविया दहि-खीर सप्पि संपुण्णा। वरपउम-पिहिय-वयणा; जिणवर पूयाभिसेयत्थे।।[15]

अर्थात, जिनेश्वर की पूजा के अभिषेक के लिए दहीं, दूध और घी से भरे हुए और जिनका मुख उत्तम पुष्पों से ढका हुआ है वैसे पूर्ण कलश द्वार पर रखे. पउमचरियं की ७८ और ७९ वी गाथा में सुगन्धि गंधयुक्त जल, दूध, दहिं और घी के द्वारा परमात्मा को अभिषेक करने से जो लाभ प्राप्त होते हैं उसका भी विस्तार में वर्णन किया गया है.

श्री बृहत्कल्प भाष्य और समवायांग टिका में जिनप्रतिमा के पूर्वकालीन स्नानोत्सव के विवरण मिलते हैं जिसमे प्रभु के मेरु पर्वत के जन्मोत्सव की तरह उत्कृष्ट द्रव्यों से अभिषेक किया जाता था. यह स्नानोत्सव पर्वों और प्रतिष्ठा प्रसंग आदि विशेष अवसर पर होते थे और जिनके दर्शन करने श्रमण और श्रावक संघ दूर दूर से आते थे[16] [17].


परमात्मा की गंध-वासचूर्ण पूजा (तस्वीर: श्री मिहिरभाई वखारिया) 


C. मध्य और अर्वाचीन काल में द्रव्य पूजा

मध्यकाल के दौरान पूजा पद्धति में नयी क्रियाएँ देखने मिलती हैं. चैत्यवासीयों[18] का प्रभाव बढ़ने से पूजा सम्बन्धी क्रियाओं का विशेष प्रचलन हुआ. इसी काल में अनेक ग्रंथों की रचना हुई जिसमे आचार्य श्री हरिभद्रसुरि, आचार्य हेमचंद्रसूरि, आचार्य शांतिसूरि, आचार्य जिनप्रभसुरि ने विशेष योगदान दिया.

1. आचार्य हरिभद्रसुरि के ग्रंथों में पूजापद्धति

लगभग ईस्वी की आठवी सदी[19] में १४४४ ग्रंथो के रचइता आचार्य श्री हरिभद्रसूरि ने अपने अनेक ग्रंथ - ललितविस्तरा, पंचशक प्रकरण, षोडशेक प्रकरण, सम्बोध प्रकरण, पुजाष्ठक, योगबिंदु, हरिभद्रिय समारादित्य कथा, पंचवस्तुक आदि में जिनपूजा विधि का वर्णन किया है.

योगबिंदु में पूजा की निम्नलिखित विधि बताई है -
पुष्पैश्च बलिना चैव, वस्त्रे: स्तोत्रैश्च शोभनै:। देवानां पूजनं ज्ञेयं, शौचश्रद्धासमन्वितम् ।।[20]

अर्थात् पुष्प, नैवेद्य, वस्त्र और स्तोत्र से सौच एवं श्रद्धा पूर्वक देवपूजन करना चाहिए.

षोडशेक प्रकरण अनुसार-
स्नान विलेपन, सुसुगन्धिपुष्प, धुपाधिभिः शुभै: कान्तम्। विभावनुसारतो यत्काले, नियतं विधानेन।।
अनुपकृत परहितरत: शिवदस्त्रिदशेश पूजितो भगवान्। पूज्योहितकामनामिति, भक्त्या पूजनं पूजा।।
[21]

अर्थात् स्व-वैभव के अनुसार प्रतिदिन नियत समय पर स्नान, विलेपन, सुगन्धि पुष्प, धूप आदि के द्वारा मोक्षदायक, देवेंद्र पूजित एवं हितकामियों के लिए पूज्य ऐसे वीतरागी परमात्मा का भक्ति भावों से युत होकर पूजन करना पूजा है.[22]

पंचवस्तुक में निम्नलिखित विधि का प्ररूपण किया है –
सुहगंधधूवपाणिअसव्वोसाहिमाइएहीँ ता णवरं। कुंकुमगाइविलेवणमइसुरहिं मण हरं मल्लं ।।
विविहणिवेअणमारत्तिगाइ धूवथयवंदणं विहिणा । जहसत्ति गीआवइअच्चणदाणाइअं चेव ।।
[23]

अर्थात् गंध, धूप, जल, सुगन्धि औषधि, कुंकुम (केसर), विलेपन, सुगन्धि पुष्पमाला, विविध नैवेद्य, आरती आदि से द्रव्य पूजा करनी चाहिए और भावपूजा में विधिपूर्वक चैत्यवंदन, गायन, वादन, नर्तन (नृत्य),दान करना चाहिए. उल्लेखनीय है की भगवती सूत्र की चूर्णी[24] और इस ग्रन्थ में सर्वप्रथम आरती का उल्लेख प्राप्त होता है.

सम्बोध प्रकरण में पूजाविधि के बारे में लिखते हुए ग्रंथकार कहते हैं -
न्हवणविलेवणआरहणवत्थफलगंधधूवपुप्फेहिं। किरइ जिणंगपूया, तत्थ विही एस नायव्वो।।
आरत्तियमववयारण, मंगलदीवं च निम्मियं पच्छा। चउवारेहिं विनिम्मं, छणं च विहिणा उ कायव्व।।
[25]

अर्थात् स्नान, विलेपन, आभूषण, वस्त्र, फल, गंध, धूप, और पुष्पों द्वारा पूजा करनी चाहिए. आरती उतारने के बाद मंगलदीपक करना चाहिए. आरती और मंगलदीपक को चार बार ऊपर से निचे उतारना चाहिए और आरती और मंगलदीपक के समय पर विधि से उत्सव करना चाहिए. आरती-मंगलदीपक के समय उत्सव के विधान को विस्तारपूर्वक धर्मसंग्रह में बताया गया है की श्रावको को दोनों तरफ धुप उवेखना चाहिए, अखंड जलधारा और पुष्पवृष्टि करनी चाहिए.

पंचाशक प्रकरण में पूजा में उपयोगी साधनो का निम्नलिखित उल्लेख किया है -
गंधवरधूवसव्वोसहीहिं उदगाइएहिं चित्तेहिं। सुरहिविलेवण-वर कुसुमदामबलिदीवएहिं च।।
सिद्धत्थयदहिअक्खयगोरोयणमाइएहिं जहलाभं। कंचणमोत्तियरणादामएहिं च विविहेहिं ।।
गन्धवरधूपसर्वौषधिभिरुदकादिकै: चित्रै:। सुरभि विलेपन-वरकुसुमदाम- बलि-दीपकैश्च ।।
सिद्धार्थकदधिअक्षतगोरोचनादिकै: यथा लाभम् । कञ्चनमौक्त्तिकरत्नादिदाकैश्च विविधै ।।
[26]

अर्थात् सुगन्धि धूप, सुगन्धित औषधिओं, विभिन्न प्रकार के रस एवं जल, सुगन्धि विलेपन, श्रेष्ठ पुष्पमालाओं, नैवेद्य, दीपक, सिद्धार्थक (सफेद सरसों), दधि (दही), अक्षत, गोरोचंदन, आदि में जो प्राप्त हो उनसे पूजा करनी चाहिए. अथवा सुवर्ण आभूषण, मोती माला, रत्न माला आदि से अपनी समृद्धि के अनुसार जिनपूजा करनी चाहिए. इस ग्रन्थ में मंगलदीपक का भी विशेष उल्लेख पाया जाता है-

मंगलदीवा य तहा घयुगलपुण्णा सुभिक्खुभक्खा य। जववारयण्णयस्थिगादि सव्वं महारंमं।।[27]

अर्थात् जिनबिम्ब के समक्ष घी और और गुड़ से युक्त मंगलदीपक रखना चाहिए तथा गन्ने के टुकड़े और मिष्ठान्न आदि रखना चाहिए तथा जौ के अंकुर, चंदन का स्वस्तिक आदि सभी प्रकार के रमणीय आकार बनाने चाहिए.

इन सभी उल्लेखों में प्राप्त द्रव्यों की सूचि को बहेतर समझने के लिए निचे दिए कोष्ठक में इन सबका निरूपण किया है. आश्चर्य की बात है की आचार्य श्री हरिभद्रसूरिश्वरजी महाराज के ऊपर दिए गए ग्रन्थो में पुष्प पूजा के अतिरिक्त बाकी सारे द्रव्यों में भिन्नता देखने मिलती है. इस विषय पर एक अलग संशोधन की आवश्यकता है.

निचे दिए गए कोष्ठक को अपने स्मार्टफोन में ठीक से पढ़ने के लिए screen को rotate करें.

द्रव्य*

षोडशेक प्रकरण

पंचाशक प्रकरण

योगबिंदु

पंचवस्तुक

सम्बोध प्रकरण

पुष्प/ पुष्पमाला

a

a

a

a

a

विलेपन

a

a


a

a

धूप

a

a


a

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नैवेद्य


a

a

a


स्नान

a



a

a

सुगन्धि औषधि


a


a


दीपक


a




सफेद सरसों


a




दही


a




आभूषण


a




वस्त्र



a


a

वासक्षेप




a

a

फल





a

आरती




a

a

मंगल दीपक


a



a


इन सभी के आलावा आचार्य श्री हरिभद्रसूरि ने ललितविस्तरा में चतुर्विध पूजा और सम्बोध प्रकरण में पंचोपचारी पूजा, अष्टोपचारी पूजा और सर्वोपचारी पूजा का वर्णन किया है जिसका विस्तार हम आगे करेंगे.

प्रभु प्रतिमा का गात्र लुंछन (तस्वीर: श्री पारसभाई शाह)


2. चतुर्विध पूजा

आचार्य श्री हरिभद्रसूरि द्वारा रचित ललितविस्तरा के उल्लेखानुसार ४ प्रकार की पूजा बताई है – 

पुष्पाऽऽमिषस्तोत्र-प्रतिपत्तिपुजानां यथोत्तरं प्राधान्यम[28]

अर्थात् पुष्प, आमिष (नैवेद्य), स्तोत्र और प्रतिपत्ति (प्रभु आज्ञा पालन), इन चार प्रकार की पूजाओं में उत्तरोत्तर एक दूसरी से प्राधान्य हैं.

११वी सदीमे[29] आचार्य श्री जिनचन्द्रसूरि द्वारा रचित "संवेग रंगशाला" में बताया है की गृह और संघ मंदिर में शक्ति अनुसार श्रेष्ठ साधको से पंच अभिगम पूर्वक द्रव्य भाव युक्त त्रिकाल पूजा करनी चाहिए. भोजन के समय भी गृह जिनालय में पुष्प, नैवेद्य, वस्त्र एवं स्तोत्र पूर्वक चतुर्विध पूजा करनी चाहिए. संध्या के समय पुनः परमात्मा की पूजा कर के सारगर्भित स्तोत्र स्तुति पूर्वक गृह मंदिर में चैत्यवंदन करना चाहिए[30].

१२वी सदी में आचार्य नेमिचन्द्रसुरि द्वारा रचित प्रवचनसारोद्धार[31] में यथोचित (१) पुष्प, (२) फल, (३) आहार (४) वस्त्र आदि के द्वारा उपचार करने को पूजा कहा है[32]
यथौचित्येन पुष्पफलाऽऽहारवस्त्राऽऽदिभिरुपचारे।[33]

इस टिका में अमूल्य रत्न से भगवान को अलंकृत करना, अष्टमंगल आलेखना , नैवेद्य, मंगल दीपक, जलपात्र धरना, गोरोचंदन, कस्तूरी से भगवान के ललाट पे तिलक करना और अंत में आरती उतारने का भी विधान बताया है[34].

सुगन्धित अखंड पुष्प 


3. पंचोपचारी पूजा

पांच प्रकार की पूजाओं से युक्त पूजा को शास्त्रीय भाषा में पंचोपचारी पूजा कहा गया है. ईस्वी की ८वी सदी से ले कर १५वी सदी तक पंचोपचारी पूजा का मुख्यत्व: वर्णन पाया जाता है जिसमे (१) पुष्प, (२) अक्षत (३) गंध (वासक्षेप) (४) धूप एवं (५) दीपक द्वारा पूजा की जाती थी. यह पूजा श्रावको द्वारा नित्य की जाती थी और इसमें स्नान (अभिषेक), विलेपन, फल, नैवेद्य आदि का समावेश नहीं होता था. निम्नलिखित ग्रंथो में इस पूजा का उल्लेख प्राप्त होता है -

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ग्रन्थ

श्री सम्बोध प्रकरण

श्री चैत्यवंदन महाभाष्य

श्री उपदेश तरंगिणी

श्री श्राद्धविधि प्रकरण

ग्रन्थकार 

आचार्य हरिभद्रसूरि

आचार्य श्री शांतिसूरि

श्री रत्नमण्डनगणी

आचार्य श्री रत्नशेखरसूरि

रचना काल

८वी सदी

१०वी सदी[35]

१५वी सदी[36]

१५वी सदी[37]

श्लोक/ गाथा

भणिया पंचुवयारा कुसुमक्खय गंध-धूप-दिवेहिं। भत्ती बहुमाण वन्नजणणाणासायणा विहीहिं।।[38]

तहियं पंचुवयारा, कुसुमक्खय गंध-धूप-दिवेहिं।[39]

पुष्पाक्षतगन्धधूप दीपैर्वा भवति।[40]

तहियं पंचुवयारा, कुसुमक्खय गंध-धूप-दिवेहिं।[41]

द्रव्य एवं क्रम

(१) पुष्प

(१) पुष्प

(१) पुष्प

(१) पुष्प

(२) अक्षत

(२) अक्षत

(२) अक्षत

(२) अक्षत

(३) गंध

(३) गंध

(३) गंध

(३) गंध

(४) धूप

(४) धूप

(४) धूप

(४) धूप

(५) दीपक

(५) दीपक

(५) दीपक

(५) दीपक


धुप-दीपक-पुष्प की श्रेणी (तस्वीर: श्री पारसभाई शाह)


4. अष्टोपचारी पूजा

आठ प्रकार के द्रव्यों द्वारा की जाने वाली पूजा को शास्त्रीय भाषा में अष्टोपचारी पूजा कहा गया है. वर्तमान में प्रचलित अष्टप्रकारी पूजा का उद्भव अष्टोपचारी पूजा से ही हुआ है ऐसा कहा जा सकता है. पंचोपचारी पूजा की तरह अष्टोपचारी पूजा का भी विवरण की ८वी सदी से ले कर १५वी सदी के अनेक ग्रंथो में पाया जाता है. इस पूजा में पुष्प, गंध (वासक्षेप), धूप, दीपक, अक्षत, नैवेद्य, फल और जलपात्र का उपयोग किया जाता था. परन्तु प्रत्येक ग्रन्थ में इसका क्रम भिन्न पाया जाता है जो निचे दिए गए दो कोष्ठकों से पता चलेगा. इस पूजा प्रभु के समक्ष जलपात्र (धरने) रखने का विधान था जो आज लुप्त हो चूका है. कहीं-कहीं जलाभिषेक और जलपात्र दोनों का भी विधान मिलता है.

श्री मुनिचंद्राचार्य रचित, प्रकरणसमुच्चय: के "श्रावकवर्षाभिग्रहा" खंड में श्रावक के चातुर्मासिक नियमो का वर्णन करते हुए ग्रंथकार ने लिखा है की “श्रावको को हर महीने में चार बार अष्टोपचारी पूजा, चार महीनो में एक बार वस्त्र पूजा, गृह मंदिर में अथवा गाँव मंदिर में एक बार प्रक्षाल, अष्टमी-चतुर्दशी के दिन मंदिर की विशेष प्रमार्जना आदि करनी चाहिए”. इस विवरण से यह पता चलता है की मध्यकाल में अष्टोपचारी पूजा, स्नान (अभिषेक), विलेपन आदि की विधि विशेष दिनों में ही की जाती थी[42].

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कोष्ठक – १

ग्रन्थ

श्री सम्बोध प्रकरण

श्री चैत्यवंदन महाभाष्य

धर्मरत्न करण्डक

विजयचंदचरियं

ग्रन्थकार 

आचार्य हरिभद्रसूरि

आचार्य श्री शांतिसूरि

आचार्य श्री वर्धमानसूरि

श्री चंद्रमहत्तरजी

रचना काल

८वी सदी

१०वी सदी[43]

१०वी सदी[44]

११वी सदी[45]

श्लोक/ गाथा

तहियं पंचुवयारा कुसुमक्खयगंधधूवदिवेहिं।

नेविज्जजलफलेहिं, जुत्ता अट्ठाोवयारा वि ।।[46]

तहियं पंचुवयारा कुसुमऽक्खय-गंध-धूव-दिवेहिं।

फल जल नेविज्जहिं, सहऽट्ठरुवा भवे सा उ ।।[47]

-

"वरगंधधूवचुक्खक्खएहिं कुसुमेहिं पवरदिवेहिं।

नेविज्जफलजलेहिं य, जिणपूआ अट्ठहा होइ ।।[48]

द्रव्य एवं क्रम

(१) पुष्प

(१) पुष्प

(१) सुगन्धि पुष्प

(१) श्रेष्ठ गंध

(२) अक्षत

(२) अक्षत

(२) गंध

(२) धूप

(३) गंध

(३) गंध

(३) धूप

(३) अखंड अक्षत

(४) धूप

(४) धूप

(४) दीप

(४) पुष्प

(५) दीपक

(५) दीपक

(५) अक्षत

(५) दीपक

(६) नैवेद्य

(६) फल

(६) फल

(६) नैवेद्य

(७) फल

(७) जलपात्र

(७) घृत (घी)

(७) फल

(८) जलपात्र

(८) नैवेद्य

(८) जलपात्र

(८) जलपात्र



कोष्ठक – २

ग्रन्थ

श्री योगशास्त्र (टिका)

कुमारपाल प्रतिबोध

श्री श्राद्धविधि प्रकरण

श्री आचारोपदेश

ग्रन्थकार 

श्री हेमचन्द्राचार्य

श्री सोमप्रभाचार्य

आचार्य श्री रत्नशेखरसूरि

श्री चारित्रसुंदरगणी

रचना काल

१२वी सदी[49]

१२वी सदी[50]

१५वी सदी

१५वी सदी[51]

श्लोक/ गाथा

"गन्धैर्माल्यैर्विनिर्यद्बहलपरिमलैरक्षतैर्धूपदिपै:

सान्नाज्यै: प्राज्यभेदैश्चरुभिरूपहृतै: पाकपूतै: फलैश्च। अम्भ: संपूर्णपात्रैरिति हि जिनपतेरर्चना मष्टभेदां, कुर्वाणा वेश्मभाज: परमपदसुखस्तोममाराल्लभन्ते।।[52]

वर कुसुम-गंध-अक्खय, फल-जल-नेविज्ज- धूव-दिवेहिं।

अट्ठविह कम्महणाणी, जिण-पुआ अट्ठहा होइ।।[53]

कुसुमक्खय -गंध-पईव, धूव-नैवेज्ज-फल-जलहिं पुणो।

अट्ठविह कम्महणाणीं , अट्ठवयारा हवई पूआ।।[54]

द्वितीयो वर्ग, श्लोक १४-२३*[55]

द्रव्य एवं क्रम

(१) गंध

(१) पुष्प

(१) पुष्प

(१) चन्दन

(२) पुष्पमाला

(२) गंध

(२) अक्षत

(२) पुष्प

(३) अक्षत

(३) अक्षत

(३) गंध

(३) धूप

(४) धूप

(४) फल

(४) दीपक

(४) अक्षत

(५) दीपक

(५) जलपात्र

(५) धूप

(५) फल

(६) नैवेद्य

(६) नैवेद्य

(६) नैवेद्य

(६) नैवेद्य

(७) फल

(७) धूप

(७) फल

(७) दीपक

(८) जलपात्र

(८) दीपक

(८) जलपात्र

(८) जलपात्र


* आचारोपदेश ग्रन्थ में "पुजाष्टकम्" (आठ प्रकारी पूजा) के पूर्व में स्वच्छ जल से अभिषेक करने का विधान बताया है परन्तु अंत में जलपात्र धरने को जलपूजा कहा गया है.

प्रभु के समक्ष सुगन्धि जल युक्त जलपात्र (तस्वीर: श्री पारसभाई शाह)

5. सर्वोपचारी पूजा

श्री चैत्यवंदन महाभाष्य के अनुसार ऋद्धिमान श्रावको द्वारा पर्व के दिनों पे या रोज स्नान-विलेपन- पुष्प -आभूषण -फल -नैवेद्य- नाटक (नृत्य)- गीत आदि से सर्वोपचारी पूजा की जाती है[56]. स्नान पूजा और विलेपन पूजा का समावेश पंचोपचारी और अष्टोपचारी पूजा में नहीं किया गया था उसका समावेश सर्वोपचारी पूजा में किया गया था.

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ग्रन्थ

श्री सम्बोध प्रकरण

श्री चैत्यवंदन महाभाष्य

श्री श्राद्धविधि प्रकरण

ग्रन्थकार 

आचार्य हरिभद्रसूरि

आचार्य श्री शांतिसूरि

आचार्य श्री रत्नशेखरसूरि

रचना काल

८वी सदी

१०वी सदी

१५वी सदी

श्लोक/ गाथा

सव्वोवयारपूया, न्हवणवच्चणवत्थभूसणाईहिं। फलबलिदीवाईनट्ट-गीयआरत्तियाईहिं।।[57]

सव्वोवयार जुत्ता ण्हाण-ऽच्चण-नट्ट-गीयमाईहिं।

पव्वाइसु कीरइ निच्चं वा इड्ढिमंतेहिं[58]

 

सव्वो वयारपूआ। न्हवणवच्च वच्छ भूसणाईहिं।।

फलबलि दीवाइ। नट्ट-गीअ आरत्ति आईहिं।।[59]

द्रव्य

(१) स्नान

(१) स्नान

(१) स्नान

(२) पूजन (गंध/पुष्प)

(२) विलेपन

(२) पूजन (गंध/पुष्प)

(३) वस्त्र

(३) नाटक

(३) वस्त्र

(४) आभूषण

(४) गीत

(४) आभूषण

(५) फल

आदि

(५) फल

(६) नैवेद्य

 

(६) नैवेद्य

(७) दीपक

 

(७) दीपक

(८) नाटक  (नृत्य)

 

(८) नाटक  (नृत्य)

(९) गीत

 

(९) गीत

(१०) आरती

 

(१०) आरती



नृत्य पूजा (तस्वीर: श्री सौरभभाई मेहता)

6. श्राद्धदिनकृत्य में पूजा पद्धति


लगभग १३वी सदीमे[60] आचार्य श्री देवेन्द्रसूरि द्वारा रचित श्राद्धदिनकृत्य ग्रन्थ में बहुत विस्तार से द्रव्य पूजाविधि का विवरण किया है-

काऊणं विहिणा ण्हाणं, सेय वत्थ नियंसणो। मुहकोसं तु काऊणं, गिहबिंबाणि पमज्जए।। (२४)
घुसिणकप्पूरमीसं तु, काउं गंधोदगंवरं। तओ भुवणनाहे उ, न्हवेइ भत्तिसंजुओ।। (५९)
गंधोदएण न्हवणं, विलेवणं पवर पुफ्फमाईहिं। कुज्जा पूयं फलेहिं, वत्थेहिं आभरणमाईहिं।। (६०)
सुकुमालेण वत्थेणं, सुगंधेणं तहेव य। गायाइं विगयमोहाणं, जिणाणमणुलुहए।।(६१)
कप्पूरमीसियं काउं, कुंकुमं चंदणं तहा। तओ य जिणबिंबाणि, भावेण मणुलिंपए।। (६२)
वन्नगंधोवमेहिं च, पुप्फेहिं पवरेहि य। नाणापयारबंधेहिं, कुज्जा पूयं वियखणो।। (६३)
वत्थगंधेहिं पवरेहिं, हिययाणंददायए। जिणे भुवणमहिए, पूयए भत्तीसंजुओ।। (६४)
संखकुंदोवमेहिं च, अक्खंडफलिएहि य। अक्खएहिं विसिट्ठेहिं, लिहए अट्ठमंगले।। (६५)
दप्पणभद्दासणवद्धमाण सिरिवच्छमच्छवरकलसा। सत्थियनंदावत्ता, लिहिआ अट्ठट्ठमंगलया।। (६६)
कुसुमेहिं पंचवन्नेहिं, पूयए अट्ठमंगले। चंदणेण विसिट्ठेण, दले पंचंगुलीतलं।। (६७)
कुसुमेहिं पंचवन्नेहिं,पूयए भत्तीसंजुओ। चंदणेण तहेवावि, तओ पंचंगुलीतलं।। (६८)
अगरकप्पूरमीसं तु, दहे धूवं वियक्खणो। आरतियाइपज्जंतं, करे किच्चं तओ पुणो।। (६९)
देविंददाणविंदेहिं, नाराएणं जहा कयं। पभावईइ देवीए, तहा नट्टं करे विऊ।। (७०)
[61]

अर्थात्, श्रावक को विधि पूर्वक श्वेत वस्त्र एवं मुखकोष धारण कर प्रतिमा प्रमार्जन करनी चाहिए. चन्दन, कपूर और सर्व उत्तम औषधिओं से जल को सुगन्धित कर प्रभु का स्नान करना चाहिए. जिनप्रतिमा का स्नान करने के बाद प्रतिमा के अंगो को अतिशय कोमल और सुगन्धि वस्त्रो से पोंछना चाहिए. चन्दन, कपूर और केसर को मिश्रित कर उससे परमात्मा का विलेपन करना चाहिए. सुन्दर वर्ण वाले और सुगन्धि ऐसे पुष्पों को गूँथ के पुष्पों की विविध रचना कर पुष्प पूजा करनी चाहिए. बहुमूल्य रेशमी वस्त्र से वस्त्र पूजा करनी चाहिए और उत्तम सुगन्धि द्रव्य (वासक्षेप आदि) से गंध पूजा करनी चाहिए. श्वेत और अखंड ऐसे शाली और तंदुल जाती के अक्षत के द्वारा अष्टमंगल -दर्पण, भद्रासन, वर्धमान, श्रीवत्स, मत्स्य, कलश, स्वस्तिक और नंद्यावर्त की रचना करनी चाहिए. पंचरंगी पुष्पों से अष्टमंगल को पूजना चाहिए और चन्दन-कपूर-केसर मिश्रण में पांचो उंगलिओ को डुबो कर हाथ के थापे मारने चाहिए. कपूर मिश्रित लोबान और गुगळ वगैरे धुप से धुप करना चाहिए. उसके बाद आरती तक सारे कार्य करने चाहिए. आरती के अवसर पे जिस तरह शक्रेन्द्र, चमरेन्द्र और प्रभावती ने नृत्य भक्ति की वैसा नृत्य करना चाहिए.

सरस सुगन्धित विलेपन 


7. अभिषेक का विधान

पूर्व और मध्यकाल के अनेक ग्रंथो में हमें स्नान पूजा (अभिषेक) का उल्लेख मिलता है और कई ग्रंथो में नहीं प्राप्त होता. परन्तु सामान्य श्रावकों के द्वारा नित्यस्नान (नित्य अभिषेक) की विधि पर्वादि/कल्याणक के दिनों में अथवा अपने नियम, ऋद्धि, प्रतिमा पदार्थ, या परंपरा अनुसार की जाती थी, जिसका प्रमाण हमें निम्नलिखित उल्लेखों से प्राप्त होता है-

श्री हरिभद्रसूरिने, सम्बोध प्रकरण में जलपूजा का समावेश अंग पूजा में नहीं पर अग्र पूजा (जलपात्र धरना) में किया है-
गंधव्वनट्टावाइय - लवणजलारत्तियाइ दिवाई। जं किच्चं तं सव्वं, ओयरइ अग्गपूयाए।।[62]

अर्थात्, प्रभु के समक्ष गीत गाना, नृत्य करना, लूण उतारना, जल(पात्र) धरना, आरती उतारना, (मंगल) दीपक करना, यह सारे कर्तव्यों का समावेश अग्रपूजा में होता है.

श्री हरिभद्रसूरि, इस ग्रन्थ में यह भी बताते हैं की–
जह मिम्मयपडिमाणं, पूया पुप्फाइएहिं खलु उचिया। कणगाइनिम्मियाणं, उचियतमा मज्जणाईं वि।।[63]

अर्थात्, जिस तरह मिट्टी और वेळु आदि की प्रतिमा की पूजा पुष्प आदि से करनी उचित है वैसे ही सुवर्णआदि (पंचधातु) की प्रतिमाओं का पक्षाल वगेरे करना उचित्तम है. इस उल्लेख से हम समझ सकते हैं की सारी प्रतिमाओं का नित्य अभिषेक नहीं होता था.

श्री हरिभद्रसूरि, चतुर्थ पंचाशक में बताते हैं की पानी की तरह घी, दूध, आदि से भी जिनबिम्ब का अभिषेक करने द्वारा या जिनबिम्ब के सामने रखने द्वारा; जिस प्रकार से रूढ़ि (परंपरा) हो उस प्रकार से करनी चाहिए; दोनों प्रकार से की गई पूजा जलपूजा कहलाती है[64].

प्रकरणसमुच्चय: (जिसकी चर्चा हम अष्टोपचारी पूजा में कर चुके हैं) में ग्रंथकार ने लिखा है की श्रावको को चार महीनो में एक बार गृह मंदिर में अथवा गाँव मंदिर में एक बार प्रक्षाल करना चाहिए.

सर्वोपचारी पूजा में ऋद्धिमान श्रावकों द्वारा पर्व के दिनों पे या रोज स्नान करने का विधान था.

इन सारे उल्लेखों से हम समझ सकते हैं की नित्यस्नान का नियम नहीं होते हुए भी इसे नित्य करने में बाधा नहीं थी. अपनी परंपरा, नियम या ऋद्धि अनुसार श्रावक जिनाभिषेक करते थे.

गंधोदक (सुगन्धि जल) द्वारा अभिषेक (तस्वीर: श्री मिहिरभाई वखारिया) 


8. जिनस्नात्र पूजा

पूर्वकाल की पूजाओं में हमने स्नानोत्सव के उल्लेखों का विवरण देख लिया था जिसमे प्रभु के जन्मोत्सव का रूपांतरण करते हुए उत्कृष्ट द्रव्यों से अभिषेक किया जाता था. इन स्नानोत्सव पर्वों को महास्नात्र कहा जाता था और यह स्नानोत्सव प्रतिष्ठा प्रसंग आदि विशेष अवसर पर ही होते थे. इन महास्नात्रों का दर्शन करने श्रमण और श्रावक संघ दूर दूर से आते थे.

मध्यकालीन आचार्यों ने इन स्नानोत्सवों का अनुसरण करते हुए लघुस्नात्रों की रचना की जिसका आयोजन पर्वादि प्रसंगो में होने लगा. ईस्वी की ९वी सदी में आचार्य जीवदेवसूरि ने ५४ प्राकृत गाथा में रची स्नात्रविधि[65] सबसे प्राचीन है. इसी के आधार पर वर्तमान प्रचलित स्नात्र विधियाँ रची गई है. इसी समय काल में श्री शिलाचार्य द्वारा रचित (और वादिवेताल आचार्य श्री शान्तिसुरि द्वारा पुनः विरचित) अर्हदाभिषेकविधि[66] में ९९ संस्कृत गाथाओं द्वारा जिनजन्माभिषेक की विशिष्ट विधि का वर्णन किया है.

१०वी सदी में आचार्य श्री शांतिसूरि के चैत्यवंदन महाभाष्य में, १२वी सदी में आचार्य हेमचंद्राचार्य के योगशास्त्र की टिका में, १५वी सदी में आचार्य श्री रत्नशेखरसूरि के सिरिसिरिवालकहा[67] और श्राद्धविधि प्रकरण आदि अनेक ग्रन्थ और कथाओं में स्नात्रपूजा के उल्लेख प्राप्त होते हैं. लगभग १५वी शताब्दी में कवि देवपाल भोजक द्वारा रचित स्नात्रविधि बहुत प्रसिद्ध हुई. इसके पश्चात अनेक गुरुभगवंतो और कविओं ने स्नात्रपूजाओं की रचना की. वर्तमान काल में १८वी सदी में श्री देवचन्द्र उपाध्याय[68] और पंडित विरविजयजी[69] द्वारा रचित स्नात्र पूजाएं खरतरगच्छ और तपागच्छ में प्रसिद्ध है.

श्राद्धविधि प्रकरण में तीन, पांच या सात कुसुमांजलि (केसर से अभिवासित पुष्प द्वारा पुष्पांजलि) आदि अर्पण कर के जो जिनेश्वर पधराये हो उनके नाम का जन्माभिषेक कलश के पठन करने की विधि बताई गई है. इस ग्रन्थ में वर्णित स्नात्र पूजा की कुछ क्रियाएँ आज लुप्त सी हो गई है जैसे[70]
  • जिनप्रतिमा के समक्ष केसर मिश्रित जल का कलश रखना,
  • धूप से धूपित कलश में सुगन्धि जल भर के श्रेणीबद्ध जिनप्रतिमा के समक्ष रखना और उन्हें निर्मल वस्त्र से ढके रखना,
  • श्रावकों द्वारा कुसुमांजलि करने से पहले अपने हाथों को चन्दन द्वारा लींपन करना,
  • पांच वर्ण के पुष्पों द्वारा कुसुमांजलि अर्पण करना,
  • सम्पूर्ण अभिषेक में जिनप्रतिमा का मस्तक पुष्पों से ढके रखना,
  • सर्व प्रकार के धान्य, पकवान्न, शाक, विगय, घी, गुड़, साकर, फलादि, बलि (नैवेद्य) चढ़ाना,
  • लघुवृद्ध व्यहवार का उल्लंघन न करना (वृद्ध पुरुष पहले स्नात्र करें, फिर दूसरे सब करे और स्त्रियां श्रावको के बाद करें क्योंकि जिनेश्वर देव के जन्माभिषेक के समय भी प्रथम अच्युतेन्द्र फिर यथानुक्रम से अंतिम सौधर्मेन्द्र अभिषेक करते हैं)
कुसुमांजलि (तस्वीर: श्री मिहिरभाई वखारिया)


9. जिनबिंब के अंगो की तिलक पूजा

१४वी शताब्दी तक रचित समस्त पूजा पद्धतिओं को देखते हुए हम समझ सकते हैं अंग पूजा में मुख्यत्व: पुष्प, गंध (वासक्षेप) और चंदनादि सुगन्धि द्रव्यों द्वारा विलेपन का विधान था. कई ग्रंथों में पर्व के दिनों पे या रोज स्नान (अभिषेक) करने का भी विधान था. परन्तु वर्तमान काल में जिस तरह चन्दन- केसर द्वारा प्रभु के नव अंगो की तिलक पूजा होती है उस तरह का कोई भी उल्लेख हमें आगम ग्रन्थ, आचार्य हरिभद्रसूरि की पूजा पद्धतियां, आदि में प्राप्त नहीं होता. प्रभु के अंगो पे तिलक पूजा की क्रमागत उन्नति हम निम्नलिखित उल्लेखों से समझ सकते हैं-

अष्टपुष्पी पूजा - लगभग ८वी सदी में आचार्य हरिभद्रसुरि द्वारा रचित पुजाष्ठक और १०वी सदी में आचार्य वर्धमानसूरि द्वारा रचित धर्मरत्न करण्डक[71] में अष्टपुष्पी पूजा का वर्णन पाया जाता है. मस्तक, हृदय, उदर (पेट), पीठ, दोनों बाहु और दो पैर - इन आठ अंग पर एक एक पुष्प चढ़ाना अष्टपुष्पी पूजा कहलाती है. यद्यपि इसमें केसर द्वारा तिलक करने की विधि नहीं थी फिर भी अंगो की तिलक पूजा के पीछे रहे हुए भावों का उद्भव इस पूजा से हुआ हो ऐसा कहा जा सकता है.

ललाट पूजा - १२वी सदी में रचित प्रवचनसारोद्धार की टिका में हमें तिलक पूजा का उल्लेख पाया जाता है जिसमे टीकाकार, गोरोचंदन और कस्तूरी से भगवान के ललाट पे तिलक करने का विधान बताते हैं - "भगवतश्च भालतले गोरोचना मृगमदादिभिस्ति लक्करणं"[72]

श्री जिनप्रभसुरि कृत पूजाविधि: १४वी सदी के उत्तरार्ध में श्री जिनप्रभसुरि कृत पूजाविधि में ६ तिलक के द्वारा अंगपूजा का वर्णन प्राप्त होता है. यह ऐसा प्रथम उल्लेख है जिसमे चन्दन द्वारा विविध अंगो की पूजा का ग्रंथकार ने मार्गदर्शन दिया है –

सरससुरहिचंदणेण देवस्स दाहिणजाणु-दाहिणखंध-निलाडवामखंधवामजाणुलक्खणेसु हियएण सह छसु वा अंगेसु पूअं काऊण पच्चग्गकुसुमेहिं गंधवासेहिं च पुएइ।[73]

अर्थात अच्छे सुगन्धि चन्दन द्वारा प्रभु के दाहिने ढिंचण (जानू), दाहिने कंधे, ललाट (मस्तक), बाएं कंधे और बाएं ढिंचण- इन पांच अंगो पे तथा हृदय को ले कर छह अंगो पे पूजा कर के ताज़े सुगन्धि पुष्प से सर्वांग पूजा करनी चाहिए

पूजाप्रकरण में पूजाविधि: १५वी सदी के श्री श्राद्धविधिकौमुदी ग्रन्थ में श्री उमास्वातिजी महाराज के नाम से प्रसिद्ध पूजाप्रकरण में हमें सर्वप्रथम नवांगी तिलक पूजा का निम्नलिखित उल्लेख प्राप्त होता है-

अंध्रिजानुकरांशेषु, मूर्घ्नि पूजा यथाकृतमम्। श्री चन्दनं विना नैव, पूजा कार्या कदाचन।।
नवभिस्तिलकै: पूजा, करणीया निरन्तरम्। प्रभाते प्रथमं वास पूजा कार्या विचक्षणै:।।
मध्याह्ने कुसुमै: पूजा, संध्यायां धूपदीपकात्। वामांशे धूपदाह: स्यात्, जलपात्र तू सन्मुखम्।।
[74]

अर्थात, दो चरणों, दो ढिंचण, दो हाथ, दो स्कंध और मस्तक पे पूजा करनी और चन्दन बिना कदापि पूजा न करनी. उपयुक्त क्रम से नौ तिलक से नित्य पूजा करनी (वर्तमान में प्रचलित नवांगी तिलक पूजा में कंठ, हृदय और उदर (नाभि) का समावेश होता है जिसका वर्णन पूजाप्रकरण में नहीं है) और प्रभातकाल में वासपूजा (वासक्षेप), मध्याह्न काल में पुष्पों से और संध्या काल में धूप दीपक से. धूप पात्र भगवान के वाम (बांए) अंग की तरफ और जल पात्र उनके सन्मुख रखना चाहिए. नवांगी पूजा के क्रम का समरूप उल्लेख १५वी शताब्दी में श्री चारित्रसुंदरगणी द्वारा रचित आचारोपदेश ग्रन्थ में भी पाया जाता है-

अंध्रिजानुकरांशेषु मस्तके च यथाकृतंम्। विधेया प्रथमं पूजा जिनेंद्रस्य विवेकिभी ।।[75]

इस पूजाप्रकरण में २१ प्रकारी पूजा का भी निम्नलिखित वर्णन है -

स्नानं विलेपन-विभूषण-पुष्प-वास-धूप-प्रदीप-फल-तन्दुल-पत्र-पूगै:।।
नैवेद्यवारिवसनं चमर्गतपत्र –वादित्र-गीत-नट-स्तुति-कोश-वृद्ध्या
[76]

अर्थात् (१) स्नान (२) विलेपन (३) आभरण (४) पुष्प (५) वास (वासक्षेप) (६) धूप (७) दीप (८) फल (९) अक्षत (१०) पान (११) सुपारी (१२) नैवेद्य (१३) जल (१४) वस्त्र (१५) चामर (१६) छत्र (१७) वाजिंत्र (१८) गीत (१९) नाटक (२०) स्तुति (२१) कोष वृद्धि (भंडार)

पूजाप्रकरण में पंचामृत (घी, दूध, दही, इक्षुरस एवं जल) द्वारा अभिषेक का भी विधान बताया है –
पंचामृतं तथा शान्तौ, दीप: स्यात् सगुडैर्घृते:। वह्नौ लवणनिक्षेप:, शान्तयै तुष्टयै प्रशस्यते।।[77]

अर्थात् पंचामृत स्नान तथा गुड़ के साथ घी का दीपक शांति कार्य का सूचक है और अग्निमे लवणनिक्षेप शांति तथा तुष्टि के लिए प्रसिद्ध है. इस तरह दैनिक पंचामृत अभिषेक की क्रिया भी प्रसिद्ध हुई

[विशेष नोंध: हालाँकि उमास्वाति महाराज का जीवन काल ईस्वी की पहली या दूसरी शताब्दी माना जाता है, उनके कोई भी ग्रन्थ में पूजाप्रकरण का उल्लेख प्राप्त नहीं होता. १५वी सदी के दो ग्रंथ - "श्राद्धविधिकौमुदी" और "विशंतिस्थानक विचारामृत संग्रह" में सर्वप्रथम “पूजाप्रकरण” का उल्लेख प्राप्त होता है. यदि पूजाप्रकरण वास्तव में पू. उमास्वाति महाराज की रचना होती तो ईस्वी की दूसरी सदी के पश्चात के ग्रंथो में (खास कर आचार्य हरिभद्रसूरि के ग्रन्थ एवं चैत्यवंदन महाभाष्य आदि) में उनका उल्लेख अथवा विधि की समानता अवश्य पायी जाती. उमास्वाति महाराज ने ईस्वी की दूसरी सदी में पूजाविधि बताई हो और उसका १५वी शताब्दी तक कोई उल्लेख प्राप्त न हो, ऐसा संभव नहीं है. इसीलिए इसकी रचना शैली, मध्यकालीन द्रव्यों का समन्वय (पान, सुपारी, कोषवृद्धि आदि) और उत्तरकालीन ग्रंथो में उल्लेख के आधार पर पंन्यास कल्याणविजयजी[78], प्रवर्तिनी सज्जनश्रीजी[79], साध्वी सौम्यगुणाश्रीजी[80] और डॉ सागरमल जैन[81] जैसे अनेक इतिहासकार पूजाप्रकरण को लगभग १४वी शताब्दी की कृति मानते हैं और उमास्वाति महाराज की जगह किसी अन्य की रचना मानते है. कालक्रम में रचित पूजाविधि के अनुसार हम समझ सकते हैं की अष्टपुष्पी पूजा, भाल तिलक पूजा और छह अंगी पूजा का क्रमसर विकास हुआ जिसके बाद नवांगी पूजा का लगभग १४वी शताब्दी में उद्भव हुआ.

आचार्य श्री विक्रमसूरीश्वरजी ने कुछ वर्षो पहले प्रकाशित अपनी पुस्तक "जिनपूजा पद्धति प्रतिकारिका" में बताया है की श्री उमास्वाति महाराज ने पूजाप्रकरण के आलावा द्रव्यस्तवाभिधायक प्रकरण में और आचार्य भद्रबाहु स्वामी ने पूजा पंचाशिका में भी नवांगी तिलक पूजा का उल्लेख किया है. यद्यपि यह उल्लेख कोई भी प्राचीन रचना पे पाए नहीं जाते. तत्त्व केवली गम्य है परन्तु सामान्य बुद्धि और ज्ञान से यह भी समझना उचित होगा की यदि उमास्वाति महाराज और आचार्य भद्रबाहु स्वामी ने नवांगी पूजा का विधान बताया होता तो इसके अनेक वर्षो बाद रचित प्रवचनसारोद्धार की टिका में मात्र ललाट की तिलक पूजा और आचार्य जिनप्रभसुरि कृत पूजाविधि में ६ अंगो की पूजा का भिन्न उल्लेख नहीं होता. इतने महान महापुरुषों के कथन के विरुद्ध कोई पश्चात्कालीन आचार्यों ने विधान किया हो वैसा संभव नहीं है. इसी तत्थ्य से सिद्ध होता है की पूजाप्रकरण और पूजा पंचाशिका उमास्वाति महाराज और आचार्य भद्रबाहु स्वामी के नाम से प्रसिद्ध है पर वास्तव में यह किसी और की रचना है.]

ईस्वी की १५वी शताब्दी में आचार्य जयचन्द्रसुरि रचित "विंशतिस्थानकचरितं विचारामृत संग्रह " में चन्दन मिश्रित कपूर केसर के साथ नवांगी तिलक पूजा का विधान बताया है पर इसमें नवांगी पूजा करने से पहले ललाट पे तिलक करने को कहा गया है –

कर्पूरकेसरोन्मिश्र-श्री खंडेन ततोऽर्चनाम् । कुर्वन् जिनेशितुर्माले, कुर्वीत तिलकं धूरि।।
नवांगतिलकै: कार्या, ततः पूजा जगत्पते:। अंह्रिंजानकरांशेषु, शीर्षे श्रीखंडयोगत: ।।
[82]

अर्थात् - कपूर केसर चन्दन के साथ पूजा सर्वप्रथम ललाट में तिलक करना चाहिए. उसके पश्चात चरण, जानु, हाथ, खंध और मस्तक, इन नवांग पे केसर मिश्रित चन्दन से जिनेश्वरदेव की पूजा करनी चाहिए.

ईस्वी की १७वी शताब्दी के पूर्वार्ध में[83] श्री मेघराजमुनि द्वारा रचित सत्तरभेदी पूजा में नवांगी पूजा का निम्नलिखित उल्लेख और क्रम पाया जाता है -
"पूजिये नव अंगे चरण जानु कर अंस हृदि बाहु बेउ अपार;
कंठ ललाट, शिर विलेपंता रंगभर पामिए रे भवतणो एम पार."
[84]

यह पद अनुसार (१) चरण (२) जानु (३) हाथ (४) नाभि (५) हृदय (६) खंध (७) कंठ (८) ललाट (९) शिरशिखा का नवांगी तिलक पूजा क्रम पाया जाता है. इसी कारण से अचलगच्छीय श्रावक वर्तमान में भी यह क्रम से पूजा करते हैं क्योंकि उनका मानना है की शिरशिखा मोक्ष का प्रतिक है इसिलए वहां से निचे उतरना योग्य नहीं है. वर्तमान में अन्य गच्छो की पद्धति के अनुसार शिरशिखा से भालतिलक, कंठ, हृदय नाभि का निचे उतरने का क्रम देखने मिलता है.

ईस्वी की १७वी शताब्दी के उत्तरार्ध में श्री सकलचंद्रजी उपाध्याय कृत सत्तरभेदी पूजा में वर्तमान में प्रचलित नवांगी पूजा का निम्नलिखित उल्लेख और क्रम पाया जाता है -
"प्रभु पग जानु कर अंस शिर भाल गळे, कंठ हृदि उदरे सार, अहो भाल थल कंठ हृदि उदरे चार"[85]

अर्थात (१) चरण (२) जानु (३) हाथ (४) खंध (५) शिरशिखा (६) ललाट (७) कंठ (८) हृदय (९) नाभि का नवांगी तिलक पूजा क्रम पाया जाता है. यह विधि अचलगच्छ के अलावा बाकी सारे गच्छों में वर्तमान में प्रसिद्ध है.

इन सभी उल्लेखों में नवांगी पूजा के तिलक और उनका क्रम की सूचि को बहेतर समझने के लिए निचे दिए कोष्ठक में इन सबका निरूपण किया है-

निचे दिए गए कोष्ठक को अपने स्मार्टफोन में ठीक से पढ़ने के लिए screen को rotate करें.

ग्रन्थ

प्रवचनसारोद्धार टिका

पूजाविधि

पूजाप्रकरण

आचारोपदेश

विंशतिस्थानकचरितं

सत्तरभेदी पूजा

सत्तरभेदी पूजा

ग्रन्थकार 

श्री सिद्धसेनसूरि

श्री जिनप्रभसुरि

अज्ञात. श्री उमास्वाति के नाम से प्रसिद्ध

श्री चारित्रसुंदर गणी

आचार्य श्री जयचन्द्रसुरि

श्री मेघराजमुनि

श्री सकलचंद्रजी उपाध्याय

रचना काल

१२वी सदी

१४वी सदी

~१४वी सदी

१५वी सदी

१५वी सदी

१७वी शताब्दी के पूर्वार्ध

१७वी शताब्दी के उत्तरार्ध

तिलक एवं क्रम

ललाट

दाहिना ढिंचण

दाहिना चरण

दाहिना चरण

दाहिना चरण

दाहिना - बायां चरण

दाहिना - बायां चरण

 

दाहिना कंधा

बायां चरण

बायां चरण

बायां चरण

दाहिना - बायां ढिंचण

दाहिना - बायां ढिंचण

 

ललाट

दाहिना ढिंचण

दाहिना ढिंचण

दाहिना ढिंचण

दाहिना - बायां हाथ

दाहिना - बायां हाथ

 

बायां कंधा

बायां ढिंचण

बायां ढिंचण

बायां ढिंचण

नाभि

दाहिना - बायां स्कंध

 

बायां ढिंचण

दाहिना हाथ

दाहिना हाथ

दाहिना हाथ

हृदय

ललाट मस्तक

 

हृदय

बायां हाथ

बायां हाथ

बायां हाथ

दाहिना - बायां स्कंध

शिरशिखा

 

 

दाहिना स्कंध

दाहिना स्कंध

दाहिना स्कंध

कंठ

कंठ

 

 

बायां स्कंध

बायां स्कंध

बायां स्कंध

ललाट मस्तक

हृदय

 

 

ललाट मस्तक

ललाट मस्तक

ललाट मस्तक*

शिरशिखा

नाभि


* विंशतिस्थानकचरितं में ग्रंथकार ने प्रथम ललाट में तिलक करने के बाद नवांगी पूजा का विधान बताया है.

इन सारे उल्लेखों से हम समझ सकते हैं की तिलक पूजा का प्रारम्भ १२वी सदी से ललाट पूजा के रूप में शुरू हुआ जो १४वी शताब्दी तक ६ तिलक में परिवर्तित हुए. नौ अंगो की तिलक पूजा भी १४वी सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुई पर इसमें कंठ, हृदय और नाभि के तिलको का समावेश नहीं किया गया था. यह नौ तिलक १६वी शताब्दी तक प्रसिद्ध रहे जिसके पश्चात कंठ, हृदय और नाभि का भी समावेश किया गया. इसके पश्चात भी क्रम को ले कर कुछ भिन्नता रही है.

नवांगी तिलक पूजा 


10. मांडल के ज्ञानभंडार से प्राप्त १६वी सदी की पूजापद्धति

मांडल (गुजरात) के ज्ञानभंडार से प्राप्त आचार्य श्री हिरविजयसूरि के समय के (१६वी सदी) एक प्राचीन गुटके (पुस्तक) में मारुगुर्जर भाषा में जिनपूजाविधि बताई गई है जो उस समय में प्रचलित पूजा विधि का सुन्दर विवरण करती है[86]. इस पूजाविधि में सुगन्धित जल में सुखड (चन्दन), केसर और पुष्प मिला कर अभिषेक करने की विधि बताई है (दूध आदि पंचामृत से नहीं). साढ़े तीन गज के माप के ४ अंगलुंछणे रखने का विधान बताया है - २ अंगलुंछणे को एक दिन उपयोग में लाना और बाकी २ को अगले दिन बारी-बारी से उपयोग में लाने का विधान बताया है (अर्थात् जो २ अंगलुंछणे का आज उपयोग किया हो तो कल दूसरे २ को उपयोग में लाना चाहिए). उपयोग में लाने से पहले अंगलुंछणो को चन्दन का पास दे कर पीला करने का और उनको सुगन्धित स्थानों में रखने का मार्गदर्शन दिया है.

नवांगी तिलक पूजा के क्रम में पूजाप्रकरण की विधि अनुसार दो चरण, दो ढिंचण, दो हाथ, दो स्कंध और मस्तक पे पूजा करने की विधि बताई है. कंठ, हृदय और नाभि में तिलक पूजा का समावेश नहीं किया गया है. पुष्प पूजा भी सृष्टिकर्म के अनुसार ही करने की विधि बताई है. अग्रपूजा में दीपक को परमात्मा की दाहिने, धूप को बाएं और नैवेद्य, फल और जलपात्र को सन्मुख रखने का विधान बताया है. अक्षत से फ़क्त ३ ढगली और अंत में अष्टमंगल आलेखन करने का विधान बताया है (साथिया और सिद्धशिला आलेखना का विधान नहीं है). नैवेद्य पूजा और फल पूजा के बाद प्रभु के समक्ष जलपात्र रखने का विधान बताया है. आरती और मंगल दीपक करने का स्पष्ट सूचन दिया गया है. अंत में प्रभु के समक्ष नारियल धरने का और चन्दन के थापे देने का और भंडार वृद्धि का विधान बताया है.

कोमल निर्मल अंगलुचणा (तस्वीर: श्री सौरभभाई मेहता)

11. अष्टप्रकारी पूजा

वर्त्तमान में प्रसिद्ध अष्टप्रकारी पूजा की विधि और क्रम लगभग ईस्वी की १७वी सदी में प्रारंभ हुआ. अष्टप्रकारी पूजा में अष्टोपचारी पूजा से २ भिन्नता है - जलपात्र की जगह जल पूजा का विधान है और गंध पूजा (वासक्षेप) की जगह विलेपन और नवांगी तिलक पूजा का समावेश चन्दन पूजा में किया गया है. क्रमगत जल, चन्दन, पुष्प, धूप, दीपक, अक्षत, नैवेद्य और फल पूजा का विधान अष्टप्रकारी पूजा में बताया गया है. इसी काल में दर्पण और चंवर पूजा की विधि प्रचलित हुई

श्री विरविजयजीने संवत १७५८ में अष्टप्रकारी पूजा (काव्य)[87] की रचना की - वर्तमान में इस पूजा के दोहे सबसे ज्यादा प्रचलित है.
  • पहली जल पूजा में केशर इत्यादि औषधिओं द्वारा मिश्रित निर्मल गंधोदक (सुगन्धि जल) से अभिषेक करने की विधि बताई है;
  • दूसरी चन्दन पूजा में चन्दन से विलेपन और चन्दन मिश्रित केसर-कस्तूरी द्वारा प्रभु के नौ अंगो में १३ तिलक करने विधि बताई है
  • तीसरी पुष्प पूजा में पवित्र स्थल में उगे हुए अखंड और सुगन्धित पुष्प या पुष्पमालाओं से पूजा करने की विधि बताई है. मोगरा, चंपा, मालती, केतकी, जासुद, प्रियंगु, पुन्नाग, धावडी, पाडल, जुई, बोलसरी, सेवंति, मचकुंद, चमेली, मरवो, दमणो, लाल गुलाब, कोरंटा, केवड़ा आदि पुष्पों का समावेश किया है.
  • चतुर्थ धूप पूजा में कृष्णागरु चूर्ण या दशांग धुप (अंबर, अगर, तगर, कपूर भीमसेनी बरास, किंदरू, तुरुक-नागरमोथ, कस्तूरी, शिलारस और चन्दन का मिश्रण) से मंदिर के अंदर और बाहर के भागो में धुप करना चाहिए
  • पंचम दीपक पूजा में गाय के घी द्वारा प्रगटाये हुए दीपक से पूजा करने की विधि बताई है. खास कर सूक्ष्म जीवों की हिंसा न हो इसीलिए बंध फानस में दीपक रखने का विधान बताया है.
  • षष्ठी अक्षत पूजा में शुद्ध, अखंड और उज्जवल तांदुल (चावल) द्वारा स्वस्तिक नंद्यावर्त आदि की रचना करने को कहा है. स्वस्तिक के बिच में रत्न, धनसार, कस्तूरी, गोधूम घेऊं भरने का विधान बताया है.
  • सप्तम नैवेद्य पूजा में मरकी, अमृतपाक, पतासां, रसयुक्त सुन्दर फेणी, लाखणसाइ, मगदळ, साटा, घेबर, सेव, कंसार, शक्करपारा, पेड़ा, बरफी, खाजा, खूरमा, खीर, खांड, घी, पापड़, पूरी, मोतैया, कळीसार, शाक, दाल, चावल आदि पकवानो द्वारा नैवेद्य पूजा करने को कहा है.
  • अष्टम फल पूजा में ताजे श्रीफल, बेदाना, द्राक्ष, अखोड, बादाम, पुंगीफल, मीठा नींबु, खारेख, केला, सीताफल, जमरुख, तरबुज, नीमजां, कोड़ा, आम, नारंगी, पीस्ता, खरबूजा, अंगूर, बिजोरा, सिंघोड़ा (पानीफल), अंजीर आदि से फल पूजा करने को कहा है.

उत्तम अष्टमंगल और नैवेद्य पूजा 

१७वी सदी में श्री प्रेमविमलजी ने, १८वी सदी में उदयरत्नविजयजी ने और १९वी सदी में श्री फत्तेचन्द्रसागरजी ने विभिन्न अष्टप्रकारी पूजा के रास की रचना की. इन दोनों शताब्दिओं में अनेक गुरुभगवंतोने अष्टप्रकारी पूजा के काव्यों की रचना की[88]:
  • श्री उत्तमविजयजी ने संवत १८१३ में
  • श्री पद्मविजयजी ने संवत १८१९ में
  • श्री देवविजयजी ने संवत १८२१ में
  • श्री उद्योतनविजयजी ने संवत १८२३ में - इस पूजा में आठो पूजा के पश्चात वस्त्र पूजा, लूण उतारण और आरती-मंगल दीपक की विधि बताई है.
  • श्री रूपविजयजी ने संवत १८७९ में
  • श्री कुंवरविजयजी ने १९वी सदी में

उत्तम फल पूजा 

12. सत्रहभेदी पूजा

सत्रह प्रकार के भेदों से युक्त जिनपूजा सत्रहभेदी पूजा कहलाती है. यह पूजा आगम काल से प्रसिद्ध है - श्री ज्ञाताधर्मकथा सूत्र (वृत्ति) और श्री राजप्रश्नीय सूत्र में इस पूजा का विवरण प्राप्त होता है जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं. सर्वोपचारी पूजा का ही विकसित रूप सत्रहभेदी पूजा है. निम्नलिखित उल्लेखों से हम सत्रहभेदी पूजा के द्रव्यों और प्रकार समझ पाएंगे.

श्री सम्बोध प्रकरण में निम्नलिखित उल्लेख पाया जाता है –

सत्तरसभेयभिणणा, न्हवणच्चणदेवदूसठवणं वा। तह वासचुण्णरोहण पुप्फारोहणसुमल्लाणं।।
पणवण्णकुसुमवुट्ठी, वग्धारियमल्लदामपुफ्फ़गिहं। कप्पूरपभिइगंध - च्चणमाहरणाइ विहियं जं।।
इंदद्धयस्स सोहा-करणं चउसु वि दिसासु जहसत्ती। अडमंगलाण भरणं, जिणपुरओ दाहिणे वा वि ।।
दिवाइअग्गिकम्म - करणं मंगलपईवसंजुतं। गीयं नट्टं वज्जं, अट्ठाहियसयथुईकरणं ।।
एए सत्तरभेया, आगमभणिया य दव्वपूयाए। जिणपडिमाण चउक्कग दुगनिक्खेवस्सावि भावजुया ।।
[89]

श्री उपदेश तरंगिणी में २० पूजाओं द्वारा सत्रहभेदी पूजा की विधि बताई है - :

न्हवणविलेवण अंगम्मि, चक्खुजुअलं च वास पूआए। पुप्फारूहणं मालारूहणं च, तहेय वन्नयारूहणं।।
चुन्नारूहणं जिणपुंगवाण, आहरणरोहणं चेव । पुप्फगिहपुप्फगरो, आरत्तिय मंगलपईवो।।
दीवो धूवुक्खेवं, नेवेज्जं सुहफलाण ढोअणयं । गीअं नट्टं वज्ज, पूआभेआ इमे सत्तर ।।
[90]

वर्तमान में श्री सकलचंद्रजी उपाध्याय और आत्मारामजी द्वारा रचित सत्रहभेदी पूजा विशेष प्रचलित है. दोनों की विधियां एक सामान है और निम्नलिखित १७ पूजाओं का समावेश किया गया है[91] - (१) जलपूजा, (२) विलेपन पूजा, (३) वस्त्रयुगल पूजा (बहुमूल्य वस्त्र), (४) सुगंध-वासपूजा (वासक्षेप/चन्दन, कपूर, केसर, कस्तूरी का चूर्ण), (५) पंचवर्ण पुष्प पूजा, (६) पुष्पमाल पूजा, (७) कुसुम आंगिरचना पूजा (पुष्पों द्वारा आंगी), (८) सुगन्धि चूर्ण पूजा (धनसार, अगर, सेलारस आदि का चूर्ण), (९) ध्वज पूजा, (१०) आभरण पूजा (आभूषण), (११) पुष्पगृह पूजा, (१२) पुष्पवृष्टि पूजा, (१३) अष्टमंगल पूजा, (१४) धूप-दिप पूजा, (१५) स्तवन-गीत पूजा, (१६) नाटक पूजा और (१७) वाजिंत्र पूजा.

इन सभी उल्लेखों को बहेतर समझने के लिए निचे दिए कोष्ठक में इन सबका निरूपण किया है-

निचे दिए गए कोष्ठक को अपने स्मार्टफोन में ठीक से पढ़ने के लिए screen को rotate करें.

ग्रन्थ

श्री राजप्रश्नीय सूत्र

श्री सम्बोध प्रकरण

श्री उपदेश तरंगिणी

सत्रहभेदी पूजा

सत्रहभेदी पूजा

ग्रन्थकार 

श्रुतकेवली पूर्वाचार्य

आचार्य हरिभद्रसूरि

श्री रत्नमण्डनगणी

श्री मेघराजमुनि

श्री सकलचंद्रजी उपाध्याय

रचना काल

ईस्वी पूर्व

८वी सदी

१५वी सदी

१७वी शताब्दी के पूर्वार्ध

१७वी शताब्दी के उत्तरार्ध

द्रव्य एवं क्रम

प्रमार्जन

जल

जल

जल

जल

जल

अर्चन

विलेपन

विलेपन

विलेपन

विलेपन

देवदुष्य

वस्त्रयुगल

वस्त्रयुगल

वस्त्रयुगल

गात्र लूंछन

वासपूजा

वासपूजा

गंध (वासपूजा)

वासपूजा

देवदुष्य

पुष्प

पुष्प

पुष्प

पंचवर्ण पुष्प

पुष्प

पंचवर्ण पुष्प

पुष्पमाला

पुष्पमाला

पुष्पमाला

पुष्पमाला

पुष्पगृह

वर्ण (वर्णक-पीठी)

पंचवर्ण पुष्प

कुसुम आंगिरचना

गंध

गंध

चूर्ण

चूर्ण

चूर्ण

चूर्ण

आभरण

आभरण

ध्वजा

ध्वजा

वर्ण (वर्णक-पीठी)

इन्द्रध्वज

पुष्पगृह

आभरण

आभरण

वस्त्र

अष्टमंगल

आरती

पुष्पगृह

पुष्पगृह

आभरण

दीपक

मंगलदीपक

पुष्पवर्षा

पुष्पवर्षा

पुष्पघर

आरती

दीपक

अष्टमंगल

अष्टमंगल

पुष्पवर्षा

मंगलदीपक

धूप

धूप

धूप – दीप

अष्टमंगल

गीत

नैवेद्य

गीत

गीत

धुप

नृत्य

फल

नृत्य

नृत्य

स्तुतिगान

१०८ स्तुति

गीत, नृत्य, वाजिंत्र

वाजिंत्र

वाजिंत्र


संध्या आरती (तस्वीर: श्री पारसभाई शाह)

D. उपसंहार

पूर्वकालीन उल्लेखों (ईस्वी की पांचवी शताब्दी के पूर्व) में हम देख सकते हैं की द्रव्य पूजा पद्धति में बहुत भिन्नता और बहुलता थी; कोई एक पद्धति विशेष से जिन पूजा नहीं की जाती थी. कहीं सत्रह प्रकार की पूजा का उल्लेख मिलता है तो कहीं पांच या आठ द्रव्यों द्वारा पूजा का उल्लेख मिलता है. अभिषेक विधि में द्रव्यों की भिन्नता के साथ स्नानोत्सवों का उल्लेख प्राप्त होता है. कहीं- कहीं इसका समावेश नित्य पूजाविधि में भी नहीं किया गया था. विशेष कर पूर्वकाल में गंध पूजा (वासक्षेप) अथवा विलेपन का विधान था और तिलक पूजा का प्रारम्भ इस काल में नहीं हुआ था. ईस्वी की पांचवी शताब्दी के आसपास दीपक पूजा का उल्लेख प्राप्त होता है.

मध्यकाल में आरती और मंगलदीपक की विधि के उल्लेख ८वी शताब्दी से प्राप्त होते हैं. आरती और मंगलदीपक को चार बार ऊपर से निचे उतारना चाहिए और आरती और मंगलदीपक के समय पर विधि से उत्सव करना चाहिए ऐसे विधान प्राप्त होते हैं. विशेषतः आरती और मंगलं दीपक के समय श्रावको का दोनों तरफ धुप उवेखना, अखंड जलधारा करना और पुष्पवृष्टि करने का विधान आज लुप्त हो गया है.

पुष्पवृष्टि (तस्वीर: श्री पारसभाई शाह)


इस काल में पूजा विधि को समरूप बनाने के लिए ८वी से १५वी शताब्दी के बिच चतुर्विध पूजा, पंचोपचारी पूजा, अष्टोपचारी पूजा और सर्वोपचारी पूजा का विधान प्रारम्भ हुआ. सामान्य श्रावको द्वारा पंचोपचारी पूजा की जाती थी जिसमे पुष्प, अक्षत, गंध (वासक्षेप), धूप एवं दीपक द्वारा पूजा की जाती थी और इसमें स्नान (अभिषेक), विलेपन, फल, नैवेद्य आदि का उपयोग नहीं होता था. पर्वों और विशेष दिनों में अथवा श्रावको के नियमानुसार अष्टोपचारी पूजा की जाती थी जिसमे पंचोपचारी पूजा के अतिरिक्त विलेपन, फल, नैवेद्य और जलपात्र धरने का विधान था. ऋद्धिमान श्रावको द्वारा पर्व के दिनों पे या रोज स्नान-विलेपन- पुष्प-आभूषण -फल -नैवेद्य- नाटक (नृत्य)-गीत आदि से आडंबर पूर्वक सर्वोपचारी पूजा की जाती थी. पूर्व और मध्यकाल में वस्त्रादि से पूजा करने का विधान और प्रभु के समक्ष जलपात्र धरने का विधान आज प्रायः लुप्त हो गया है.

पूर्व और मध्यकाल में सामान्य श्रावकों द्वारा नित्य अभिषेक की विधि पर्वादि/कल्याणक के दिनों में अथवा अपने नियम, ऋद्धि, प्रतिमा पदार्थ, या परंपरा अनुसार की जाती थी. ईस्वी की दूसरी शताब्दी से दूध आदि द्रव्यों द्वारा प्रभुप्रतिमा के अभिषेक का विधान प्राप्त होता है परन्तु १६वी सदी तक के उल्लेखों में मुख्यत्व: सुगन्धि जल अथवा औषधि-केसर मिश्रित जल द्वारा अभिषेक किया जाता था. वर्तमान में दूध और पंचामृत से अभिषेक की विधि प्रचलित है.

अंगलुंछणे कितने लेने और कौन से वर्ण से लेने उसमे भी परिवर्तन हुआ है. आगमो में सुगंधी लाल वस्त्र द्वारा जिनप्रतिमा को पोंछने का विधान था. १६वी शताब्दी तक साढ़े तीन गज के माप के ४ अंगलुंछणे रखने का उल्लेख मिलता है - २ अंगलुंछणे को एक दिन उपयोग में लाना और बाकी २ को अगले दिन बारी-बारी से उपयोग में लाने का विधान बताया है. उपयोग में लाने से पहले अंगलुंछणो को चन्दन का पास दे कर पीला करने का और उनको सुगन्धित स्थानों में रखने का मार्गदर्शन दिया है. वर्तमान में ३ श्वेत वस्त्रो द्वारा अंगलुंछण करने की विधि प्रचलित है.

चन्दन मिश्रित केसर घिसने की प्रक्रिया (तस्वीर: श्री पारसभाई शाह)


पूर्व और मध्यकाल में पुष्प पूजा, गंध पूजा और विलेपन का अधिक महत्त्व था. चन्दन, कपूर, केसर, कस्तूरी आदि सुगन्धि द्रव्य मिश्रित कर के परमात्मा का विलेपन करने का विधान था जिसका स्थान वर्तमान में तिलक पूजा ने ले लिया. परमात्मा के अंगो की तिलक पूजा का प्रारम्भ ईस्वी की १२वी शताब्दी में ललाट पूजा से हुआ और १४वी सदी तक ६ अंगो की पूजा होने लगी. १४वी सदी के उत्तरार्ध में ९ तिलक प्रसिद्ध हुए और १७वी शताब्दी तक आते-आते ९ अंग और १३ तिलक में परिवर्तित हुए.

आगम काल से ले कर १६वी सदी तक अक्षत द्वारा ३ ढगली और अष्टमंगल आलेखन करने का विधान था. वर्तमान में प्रसिद्ध सिद्धशिला और स्वस्तिक करने का विधान नहीं था. नैवेद्य और फल जिनबिम्ब के समक्ष धरे जाते थे, जो आज स्वस्तिक/ नंद्यावर्त और सिद्धशिला पे चढ़ाए जाते हैं. चावल के अलावा सिद्धार्थक (सफेद सरसों) से भी अष्टमंगल आलेखन किया जाता था. पंचरंगी पुष्पों से अष्टमंगल को पूजने का विधान और हाथ के थापे मारने का विधान लुप्त हो चूका है.

पूर्वकाल के जिनजन्माभिषेक का अनुसरण करते हुए महास्नानोत्सवों का आयोजन होता था जिसमे प्रभु के मेरु पर्वत के जन्मोत्सव की तरह उत्कृष्ट द्रव्यों से अभिषेक किया जाता था. इन का महास्नानोत्सवों का अनुसरण करते हुए मध्यकालीन आचार्यों ने लघुस्नात्रों की रचना की जिसका आयोजन पर्वादि प्रसंगो में होने लगा. ९वी सदी से (
लघु) स्नात्र पूजा की विधि प्रचलित हुई और १९वी सदी तक अनेक आचार्यों और कविओं ने नई स्नात्रपूजाओं की रचना की. परन्तु इनमे भी काफी परिवर्तन द्रष्टिगोचर होते हैं. स्नात्र के समय जिनप्रतिमा के समक्ष केसर मिश्रित जल का कलश रखने का विधान, कलशों को धूपने का और उनको निर्मल वस्त्र से ढके रखने की क्रिया, श्रावकों द्वारा कुसुमांजलि करने से पहले अपने हाथों को चन्दन द्वारा लींपन करने की विधि, पांच वर्ण के पुष्पों द्वारा कुसुमांजलि अर्पण करने की विधि, सम्पूर्ण अभिषेक में जिनप्रतिमा का मस्तक पुष्पों से ढके रखने की विधि, सर्व प्रकार के धान्य, पकवान्न, शाक, विगय, घी, आदि चढाने की विधि और लघुवृद्ध व्यहवार का उल्लंघन न करने की विधि आज प्रायः लुप्त हो गई है.

दर्पण पूजा (तस्वीर: श्री पारसभाई शाह)


वर्त्तमान में प्रसिद्ध अष्टप्रकारी पूजा की विधि और क्रम का प्रारम्भ लगभग ईस्वी की १७वी सदी में हुआ. मध्यकालीन अष्टोपचारी पूजा से जलपात्र और विलेपन पूजा की जगह जलपूजा और नवांगी तिलक पूजा का समावेश चन्दन पूजा में किया गया. क्रमगत जल, चन्दन, पुष्प, धूप, दीपक, अक्षत, नैवेद्य और फल पूजा का विधान अष्टप्रकारी पूजा में हुआ. इसके उपरांत सत्रहभेदी पूजा और २१ प्रकारी पूजा का विधान भी विशेष अनुष्ठानो में प्रसिद्ध हुआ.

इन पूजा भेदों को उल्लिखित करने का मुख्य कारण है आगम काल से अब तक प्रचलित विविध पूजाओं के विषय में हमारी सम्यक जानकारी हो. इन उल्लेखों से यह स्पष्ट होता है कि श्वेताम्बर परम्परा में आगम काल से लेकर अब तक हर समय में जिनपूजा का प्रवर्त्तन था; यद्यपि उनमें काल सापेक्ष अनेकशः परिवर्तन भी होते रहे, परन्तु उसके अस्तित्व पर उनका कोई प्रभाव परिलक्षित नहीं होता.

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विशेष: इस लेख में यदि कुछ त्रुटियां रह गई हो तो मुझे बताएं, मैं उन्हें सुधारने की अवश्य कोशिश करूँगा. जिनाज्ञा विरुद्ध कुछ भी लिखा गया हो तो मिच्छामि दुक्कड़म.

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विशिष्ट धूपदानी (तस्वीर: श्री मिहिरभाई वखारिया)


सन्दर्भ सूचि :

[1] ज्ञाताधर्मकथांग सूत्र भाग २, पृष्ठ संख्या १६१
[2] आगमदीप ४५ आगम गुर्जर छाया (तीसरा विभाग), मुनि दिपरत्नसागर, पृष्ठ संख्या १४५
[3] नवांगीवृत्तिकारकश्रीमदअभयदेवसूरिवरविहितवृत्तियुतं श्री ज्ञाताधर्मकथांगम् , पृष्ठ संख्या २६०
[4] जैनागम सिद्ध मूर्तिपूजा, भूषण शाह, पृष्ठ संख्या २२८
[5] श्री रायपसेणीय सूत्र, विभाग १, सूत्र ४४
[6] आगमसटीक अनुवाद, राजप्रश्नीय-जिवाभिगम १, मुनि दिपरत्नसागर, पृष्ठ संख्या १११
[7] आगमसटीक अनुवाद, जिवाभिगम-२ , मुनि दिपरत्नसागर, पृष्ठ संख्या २०९
[8] महानिसीह-सुय-खंधं, आगमप्रभाकर मुनिश्री पुण्यविजयजी, पृष्ठ संख्या ७३
[9] महानिसीह-सुय-खंधं, आगमप्रभाकर मुनिश्री पुण्यविजयजी, पृष्ठ संख्या ४७
[10] महानिशीथ आगमसुत्र हिंदी अनुवाद, आगम दिवाकर मुनि दीपरत्नसागरजी, पृष्ठ संख्या ४६
[11] आवश्यक भाष्य, १६१, १६३, ९७, उद्घृत विधि संग्रह पृष्ठ संख्या २२
[12] पूजा विधि के रहस्यों की मूल्यवत्ता मनोविज्ञान, पूज्या प्रवर्तिनी सज्जनश्रीजी म.सा., पृष्ठ संख्या ३०४
[13] पूजा विधि के रहस्यों की मूल्यवत्ता मनोविज्ञान, पूज्या प्रवर्तिनी सज्जनश्रीजी म.सा., पृष्ठ संख्या २९८-३०४
[14] The Jain Versions of Rāmāyaṇa, Dr. Nalini Joshi
[15] पउमचरियं, पृष्ठ ३९८
[16] पूजा विधि के रहस्यों की मूल्यवत्ता मनोविज्ञान, पूज्या प्रवर्तिनी सज्जनश्रीजी म.सा., पृष्ठ संख्या ३०३
[17] श्री जिनपूजापद्धति, पन्यास श्री कल्याणविजयजी गणि, पृष्ठ संख्या १३

[18] पूर्व काल में जैन श्रमण, लोगो से दूर वन्य स्थान, गुफाओं और निर्जन भूमिओं में साधना और विचरण करते थे. चातुर्मास भी नगर के बहार उद्यानों में करते थे जिससे निर्मल और निर्दोष चारित्र धर्म का पालन हो सके. परन्तु समय की विषमता की वजह से श्रमण समुदाय को बहुत अड़चने होने लगी. श्रावक संघ से दुरी, लम्बे अकाल (सूखा), गोचरी की दुर्लभता, एवं वन्य स्थानों में लोको की अप्रीति की वजह से श्रमण संघने ईस्वी की ५वी सदी से श्रावको की बस्ती, यानी नगरों में ही विचरण करना आरंभ कर दिया. नगर के जिनमंदिरो के आसपास उपाश्रयों अथवा श्रावको के घरों के निर्दोष स्थानों में श्रमण संघ ठहरने लगा. नगरादि स्थानों में रहने के बावजूद श्रमण संघ सतत विहारी रहते थे - एक स्थान में नहीं रहते थे. परन्तु समय के प्रवाह में इस मर्यादा में भी शिथिलता आई और ईस्वी की ८वी सदी तक बहुत श्रमणो ने चैत्यवास अपनाया जिसमे श्रमण जिनमंदिर और उपाश्रय में ही रहने लगे और इन स्थानों को अपना मठ बनाने लगे. ईस्वी की ८वी सदी में आचार्य श्री हरिभद्रसूरि, सम्बोध प्रकरण ग्रन्थ में चैत्यवासी साधुओं के बारे में लिखते हैं की वे आधाकर्मी आहार, सचित्त ग्रहण, तीन बार भोजन, विगई ग्रहण, पडिलेहण का त्याग, चैत्यवास (मंदिर/उपाश्रय आदि में निवास), देवद्रव्य भक्षण, हजामत और एकाकी परिभ्रमण आदि करते थे. पलंग, जोड़ा, वाहन, शस्त्र और धन आदि का परिग्रह रखते थे. ज्योतिष, मन्त्र-तंत्र, यज्ञ पूजा आदि से श्रावक वर्ग को भयभीत करते थे; नए मंदिर और उपाश्रयों का निर्माण करवाते थे. संसार सुख के लिए शस्त्रधार बिना की तपस्या, गलत अनुष्ठान, जिन प्रतिमा के रक्षण हेतु पूजा; चमत्कारिक प्रतिमाओं की भक्ति; पूजाविधि में कर्मकाण्ड, मृत व्यक्ति के लिए प्रभुपूजा -मृतद्रव्यग्रहण, पैसों के लिए आगम का व्याख्यान आदि करते थे. एक समय पे सुवहित साधुओं से ज्यादा चैत्यवासी साधुओं का संख्याबल था. चूँकि चैत्यवासी साधु, मंदिर में ही निवास करते थे और वहां का वहीवट सँभालते थे, इस काल में उन्होंनेने पूजा के अंतर्गत कर्मकाण्ड को बढ़ावा दिया और नई प्रवृत्तिओं का समावेश किया. (जैन परंपरानो इतिहास)

[19] https://www.tattvagyan.com/jain-stories/shri-haribhadrasuri/
[20] योगबिंदु, आचार्य श्री ऋद्धिसागरसूरि, गाथा ११६, पृष्ठ संख्या २११
[21] षोडशेक प्रकरण, भाग २, ९/१-२
[22] पूजा विधि के रहस्यों की मूल्यवत्ता मनोविज्ञान, पूज्या प्रवर्तिनी सज्जनश्रीजी म.सा., पृष्ठ संख्या २
[23] पंचवस्तुक ग्रन्थ भाग २, आचार्य राजशेखरसूरि, गाथा ११४१-११४२, पृष्ठ संख्या ५०५
[24] जैन मार्ग (फेसबुक पेज), आचार्य किर्तियशसूरि
[25] श्री संबोध प्रकरण, भाग १, आचार्य श्री राजशेखरसूरि महाराज, गाथा ५७, १८८, पृष्ठ संख्या ४७, १०७
[26] पञ्चाशक प्रकरणम्, डॉ. दीनानाथ शर्मा, पृष्ठ संख्या ६१
[27] पञ्चाशक प्रकरणम्, डॉ. दीनानाथ शर्मा, पृष्ठ संख्या १३९
[28] ललितविस्तरा, हिंदी विवेचन प्रकाश सहित, पंन्यास श्री भानुविजयजी गणिवर, पृष्ठ संख्या ४३
[29] श्री संवेग रंगशाला, हिंदी अनुवाद, मुनि श्री जयानंदविजयजी, पृष्ठ संख्या ४१७
[30] पूजा विधि के रहस्यों की मूल्यवत्ता मनोविज्ञान, पूज्या प्रवर्तिनी सज्जनश्रीजी म.सा., पृष्ठ संख्या ३०७
[31] प्रवचन सारोद्धार, प्रथम भाग, साध्वी हेमप्रभाश्रीजी, पृष्ठ संख्या ८
[32] पूजा विधि के रहस्यों की मूल्यवत्ता मनोविज्ञान, पूज्या प्रवर्तिनी सज्जनश्रीजी म.सा., पृष्ठ संख्या २
[33] प्रवचनसारोद्धार,१०वे द्वार की टिका
[34] पूजा विधि के रहस्यों की मूल्यवत्ता मनोविज्ञान, पूज्या प्रवर्तिनी सज्जनश्रीजी म.सा., पृष्ठ संख्या ३०९
[35] चेइयवंदणमहाभासं- गुजराती भावानुवाद सहित, आचार्य श्री राजशेखरसूरि महाराज, पृष्ठ संख्या ६
[36] सुकृतसागर याने मांडवगढ़ नो महान मंत्रीश्वर, श्री जैन आत्मानंद सभा, भावनगर, पृष्ठ संख्या ५
[37] श्राद्धविधि प्रकरण, आचार्य श्री विजय लब्धिसूरि, पृष्ठ संख्या २
[38] श्री संबोध प्रकरण, भाग १, आचार्य श्री राजशेखरसूरि महाराज, गाथा ४४, पृष्ठ संख्या ४२
[39] चेइयवंदणमहाभासं- गुजराती भावानुवाद सहित, आचार्य श्री राजशेखरसूरि महाराज, गाथा २१०, पृष्ठ संख्या ९२
[40] पूजा विधि के रहस्यों की मूल्यवत्ता मनोविज्ञान, पूज्या प्रवर्तिनी सज्जनश्रीजी म.सा., पृष्ठ संख्या १२
[41] श्री श्राद्धविधि प्रकरण, तिलकविजयजी, पृष्ठ संख्या १३१-१३२
[42] प्रकरणसमुच्चय, आचार्य रत्नसिंहसूरी, पृष्ठ संख्या १२८-१२९
[43] चेइयवंदणमहाभासं- गुजराती भावानुवाद सहित, आचार्य श्री राजशेखरसूरि महाराज, पृष्ठ संख्या ६
[44] धर्मरत्न करण्डक, ४९-६१
[45] विजयचंदचरियं, जितेंद्र बी. शाह, पृष्ठ संख्या १२
[46] श्री संबोध प्रकरण, भाग १, आचार्य श्री राजशेखरसूरि महाराज, गाथा ११०, पृष्ठ संख्या १०८
[47] चेइयवंदणमहाभासं- गुजराती भावानुवाद सहित, आचार्य श्री राजशेखरसूरि महाराज, गाथा २१०, पृष्ठ संख्या ९२
[48] विजयचंदचरियं, जितेंद्र बी. शाह, पृष्ठ संख्या १२
[49] https://en.wikipedia.org/wiki/Hemachandra
[50] कुमारपाल प्रतिबोध, मुनिराज जिनविजय, पृष्ठ संख्या iii
[51] श्राद्धविधि प्रकरण, श्री वज्रसेनविजयगणि, पृष्ठ संख्या ११
[52] श्री जिनपूजापद्धति, पन्यास श्री कल्याणविजयजी गणि, पृष्ठ संख्या १५
[53] कुमारपाल प्रतिबोध, पृष्ठ संख्या १२९
[54] श्री श्राद्धविधि प्रकरण, तिलकविजयजी, पृष्ठ संख्या १३१-१३२
[55] आचारोपदेश गुजराती अनुवाद, मुनि श्री तत्त्वप्रभविजयजी पृष्ठ संख्या १५-१८
[56] चेइयवंदणमहाभासं- गुजराती भावानुवाद सहित, आचार्य श्री राजशेखरसूरि महाराज, गाथा २१२, पृष्ठ संख्या ९२
[57] श्री संबोध प्रकरण, भाग १, आचार्य श्री राजशेखरसूरि महाराज, गाथा १९१, पृष्ठ संख्या १०९
[58] चेइयवंदणमहाभासं- गुजराती भावानुवाद सहित, आचार्य श्री राजशेखरसूरि महाराज, गाथा २१२, पृष्ठ संख्या ९२
[59] श्री श्राद्धविधि प्रकरण, तिलकविजयजी, पृष्ठ संख्या १३२
[60] श्राद्धदिनकृत्य, आचार्य राजशेखरसूरि, पृष्ठ संख्या ९
[61] श्राद्धदिनकृत्य, आचार्य राजशेखरसूरि, पृष्ठ संख्या ८८-९०
[62] श्री संबोध प्रकरण, भाग १, आचार्य श्री राजशेखरसूरि महाराज, गाथा १८७, पृष्ठ संख्या १०७
[63] श्री संबोध प्रकरण, भाग १, आचार्य श्री राजशेखरसूरि महाराज, गाथा ६७, पृष्ठ संख्या ५१
[64] जिनपूजा पद्धति प्रतिकारिका, आचार्य विक्रमसूरि, पृष्ठ संख्या ५५-५६
[65] जिन-स्नात्र-विधि: तथा अर्हदाभिषेक विधि, पंडित लालचन्द्र, पृष्ठ संख्या १८
[66] जिन-स्नात्र-विधि: तथा अर्हदाभिषेक विधि, पंडित लालचन्द्र, पृष्ठ संख्या ३२
[67] सिरिसिरिवालकहा, आचार्य श्री राजशेखरसूरि, पृष्ठ संख्या २
[68] खरतरगच्छ साहित्य कोष, पृष्ठ संख्या १३४
[69] श्रीमान् विरविजयजी कृत अष्ट प्रकारी पूजा, मुनि चारित्रविजयजी, पृष्ठ संख्या ५
[70] श्री श्राद्धविधि प्रकरण, तिलकविजयजी, पृष्ठ संख्या १३५-१३९
[71] धर्मरत्न करण्डक, ४९-६१
[72] पूजा विधि के रहस्यों की मूल्यवत्ता मनोविज्ञान, पूज्या प्रवर्तिनी सज्जनश्रीजी म.सा., पृष्ठ संख्या ३०९
[73] श्राद्धविधि प्रकरण, तिलकविजयजी, पृष्ठ संख्या ११७
[74] श्री श्राद्धविधि कौमुदी (संक्षेप:) मुनि श्री वैराग्यरतिविजयजी, पृष्ठ संख्या ६३
[75] आचारोपदेश गुजराती अनुवाद, मुनि श्री तत्त्वप्रभविजयजी पृष्ठ संख्या १९
[76] श्री श्राद्धविधि कौमुदी (संक्षेप:) मुनि श्री वैराग्यरतिविजयजी, पृष्ठ संख्या ६४
[77] श्री श्राद्धविधि कौमुदी (संक्षेप:) मुनि श्री वैराग्यरतिविजयजी, पृष्ठ संख्या ६४
[78] श्री जिनपूजापद्धति, पन्यास श्री कल्याणविजयजी गणि, पृष्ठ संख्या ३८
[79] पूजा विधि के रहस्यों की मूल्यवत्ता मनोविज्ञान, पूज्या प्रवर्तिनी सज्जनश्रीजी म.सा., पृष्ठ संख्या ३०७
[80] जैन विधि विधान सम्बन्धी साहित्य का बृहद् इतिहास भाग १, साध्वी सौम्यगुणाश्री, पृष्ठ संख्या ४५६
[81] सागरमल जैन अभिनन्दन ग्रन्थ,डॉ सागरमल जैन, पृष्ठ संख्या ४९१
[82]श्री विचारामृत संग्रह विंशतिस्थानकचरितं, शाह जीवनभाइ साकरचंद ज़वेरी, पृष्ठ संख्या ३
[83] आत्मानंद प्रकाश, ओक्टोबर १९७२, पृष्ठ संख्या २३४
[84] आर्य कल्याण गौतम स्मृति ग्रन्थ, पृष्ठ संख्या ७२
[85] विविध पूजा संग्रह, पृष्ठ संख्या १६५
[86] अनुसंधान-जनवरी २००३, आचार्य शीलचन्द्रसूरिजी
[87] श्रीमान् विरविजयजी कृत अष्ट प्रकारी पूजा, मुनि चारित्रविजयजी
[88] आत्मानंद प्रकाश, पुस्तक ६९, अंक ९
[89] श्री संबोध प्रकरण, भाग १, आचार्य श्री राजशेखरसूरि महाराज, पृष्ठ संख्या ४२
[90] पूजा विधि के रहस्यों की मूल्यवत्ता मनोविज्ञान, पूज्या प्रवर्तिनी सज्जनश्रीजी म.सा., पृष्ठ संख्या ३१
[91] विविध पूजासंग्रह, जैन प्रकाशन मंदिर, पृष्ठ संख्या ३६८
 

पुष्प पूजा (तस्वीर: श्री पारसभाई शाह)    


Comments

  1. Jai jinendra saa,
    Very clearly and nicely explained

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  2. अति सुंदर जानकारियां..🙏
    सधन्यवाद


    *प्रिंस जैन भांडिया*

    भागलपुर /बेंगलुरु्.

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  3. Bahut important or clearly information.thanku

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  4. बहुत सुन्दर जानकारी

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