क्या गृहस्थ आगम अध्ययन कर सकते हैं? - एक विमर्श



प्रत्येक धर्म-परम्परा में धर्म-ग्रन्थ या शास्त्र का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है, क्योंकि उस धर्म के दार्शनिक सिद्धान्त और आचार व्यवस्था दोनों के लिए 'शास्त्र' ही एकमात्र प्रमाण होता है. हिन्दूधर्म में वेदों का, बौद्धधर्म में त्रिपिटक का, पारसीधर्म में अवेस्ता का, ईसाईधर्म में बाइबल का और इस्लाम धर्म में कुरान का जो स्थान है, उससे भी बढ़ कर स्थान जैनधर्म में आगम साहित्य का है. जैनो के लिए आगम जिनवाणी है, आप्तवचन है और धर्म-दर्शन एवं साधना का आधार है. परन्तु एक प्रश्न उभर कर आता है - क्या गृहस्थ (श्रावक- श्राविकाऐं) आगम ग्रंथो को पढ़ कर उनका अभ्यास कर सकते हैं?

यद्यपि श्वेतांबर स्थानकवासी और श्वेतांबर तेरापंथी परंपरा में श्रावक -श्राविकाओं को आगम पढ़ने की अनुमति है और उन्हें कंठस्थ करने की परंपरा भी है, परन्तु वर्तमान जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा में गृहस्थों को आगम ग्रंथ पढ़ने की अनुमति नहीं है. पूज्य साधु भगवंतो को भी वर्षो की साधना और योगोद्वहन (जोग)[1] के पश्चात ही इन पवित्र आगम ग्रंथो को पढ़ने का अधिकार प्राप्त होता है. श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा के अंचलगच्छ को छोड़ कर कुछ गच्छों में श्रावको को रोजिंदा विधि के सूत्रों[2] को भी पढ़ने का अधिकार प्राप्त करने के लिए विविध उपधान तप की विधि बताई गई है.

श्वेतांबर परंपरा के अलग-अलग सम्प्रदाय में यह भिन्न मान्यताओं को देख कर विशेष संशोधन और विमर्श आवश्यक है. इसीलिए, यह लेख शास्त्रीय सन्दर्भ और ऐतिहासिक प्रमाणो के द्वारा इस विषय पर एक विचार करने का एक प्रयास है. वाचको से अनुरोध है की इस लेख के द्वारा वर्तमान में चल रही किसी भी प्रणालिका का खंडन या किसी भी प्रकार का निर्णय प्रस्तुत करने का भाव नहीं है – मात्र एक जिज्ञासु की खुले मन से एक विचारणा करने की भावना है.

जैन आगम ग्रंथ और उनका इतिहास

आगम शब्द का प्रयोग जैन धर्म के मूल ग्रंथों के लिए किया जाता है. नन्दिसूत्र में आगमों के लिए 'श्रुत' शब्द का प्रयोग है. श्री भगवती सूत्र में आगम के लिए 'प्रवचन' शब्द भी प्रयुक्त किया गया है. वर्तमान में उपलब्ध सम्पूर्ण जैन आगम अर्थ की दृष्टि से तीर्थंकर परमात्मा से जुड़ा हुआ है. ‘अर्थागम’ के कर्ता तीर्थंकर परमात्मा है एवं ‘सूत्रागम’ के कर्ता गणधर भगवंत एवं स्थविर भगवंत हैं. अर्थ का प्रकटीकरण तीर्थंकरों परमात्मा द्वारा होता है; गणधर भगवंत उसे शासन के हित के लिए सूत्र रूप में गुम्फित कर लेते हैं. अर्थात् तीर्थंकर प्रभु की देशना और उपदेश के आधार पर गणधर भगवंत आगमो की रचना करते हैं. गणधर भगवंत केवल अंग आगम[3] (द्वादशांगी) की रचना करते हैं और अंगबाह्य आगमों[4] की रचना स्थविर भगवंत करते हैं[5].

जैन आगमों में १४ पूर्वो का महत्वपूर्ण स्थान रहा है. ऐसा माना जाता है कि उनमें असीम श्रुतराशि समाहित थी. यह 'पूर्व' द्वादशांगी से पहले रचे गए थे, इसलिए इनका नाम 'पूर्व' है. यह चौदह पूर्व ‘दृष्टिवाद’, नामक बारहवें अंग आगम का एक विभाग है इसीलिए १४ पूर्व द्वादशांगी में ही समाहित हो जाते हैं. वर्तमान में ग्यारह अंग आगम उपलब्ध हैं और १४ पूर्वो का समावेश जिस आगम में हुआ है, वह बारहवां अंग दृष्टिवाद विच्छिन्न है.

जैन आगमों की भाषा अर्धमागधी है - प्रभु श्री महावीर अर्धमागधी भाषा में देशना देते थे क्योंकि वह सामान्य लोगो की भाषा थी. अर्धमागधी प्राकृत भाषा का ही एक रूप है. यह मगध के आधे भाग में बोली जाती थी तथा इसमें अठारह देशी भाषाओं के लक्षण मिश्रित हैं. इसमें मागधी शब्दों के साथ-साथ देश्य शब्दों की भी प्रचुरता है - इसलिए यह अर्धमागधी कहलाती है - प्रभु श्री महावीर के शिष्य मगध, मिथिला, कौशल आदि अनेक प्रदेश, वर्ग और जाति के थे; इसलिए जैन साहित्य की प्राचीन प्राकृत में देश्य शब्दों की बहुलता है.

जैन धर्म में पहले से ही यह परम्परा अस्तित्व में रही है कि जिज्ञासुजन आगमों को अत्यन्त विनय एवं आदर पूर्वक गुरुजनों से श्रवण कर उन्हें कण्ठाग्र करते तथा उन पाठों को पुनरावर्तन-पृच्छना आदि स्वाध्याय के माध्यम से स्मृतिगत रखते थे. इस प्रकार विशुद्ध रीति से संचित श्रुतसाहित्य को गुरु अपने शिष्यों को सौंपते और शिष्य पुनः उस ज्ञान को अपने प्रशिष्यों को सौंपते थे, इस तरह आगम शास्त्र स्मृति द्वारा ही सुरक्षित रखे जाते थे. हमारे पूर्वजों को प्राचीनकाल से ही ताड़पत्र, स्याही, लेखनी आदि का परिचय एवं उनकी प्रयोग विधि ज्ञात थी तथा उनमें शास्त्र लिखने का सामर्थ्य भी था, फिर भी जैन परम्परा में श्रुतसाहित्य को स्मृति पटल पर सुरक्षित रखने की परंपरा थी क्योंकि साधुओं द्वारा पुस्तक आदि का संचय किया जाये तो अपरिग्रह एवं अहिंसा दोनों व्रतों के खंडित[6] होने की पूर्ण शक्यता रहती है.

प्रभु महावीर के निर्वाण के लगभग १७० वर्ष पश्चात, प्रकृति के प्रकोप (दुष्काल, अनावृष्टि आदि) के कारण आगम पाठों का यथावत स्वाध्याय करना कठिनतर होता गया और श्रुतधारकों का अभाव होने लगा. इस समय में मगध आदि आस पास के देशों में बहुत भारी दुष्काल पड़ा; दुष्काल समाप्त हो जाने पर श्रमण पाटलिपुत्र में एकत्रित हुए और वहां अंगों का संकलन किया गया. इस सम्मेलन को 'पाटलिपुत्र-वाचना' के नाम से जाना जाता है. कुछ समय पश्चात जब आगम साहित्य का फिर विच्छेद होने लगा तो ईसवी सन् ३०० -३१३ में जैन साधुओं के दूसरे सम्मेलन हुए - एक आर्यस्कन्दिल की अध्यक्षता में मथुरा में तथा दूसरा नागार्जुनसूरि की अध्यक्षता में वल्लभी में. मथुरा के सम्मेलन को 'माथुरी-वाचना' की संज्ञा दी गयी. तत्पश्चात लगभग ईसवी सन् ४५३-४६६ में वल्लभी में आचार्य देवर्धिगणि क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में साधुओं का सम्मेलन हुआ, जिसमें सुव्यवस्थित रूप से आगमों का अन्तिम बार संकलन किया गया और उन्हें प्रथम बार लिखा गया, अर्थात् पुस्तकारुढ़ किया गया. यह सम्मेलन ‘वल्लभी -वाचना' के नाम से जाना जाता है. वर्तमान आगम साहित्य इसी संकलना का रूप है. (उपर्युक्त विवरण से इस बात का भी निश्चय हो जाता है कि उत्सर्गत: मनियों के लिए लेखन कार्य का निषेध किया गया है फिर भी आगम ग्रन्थों का विच्छेद न हो जाये, इसीलिए आगमों को लिपिबद्ध किया गया)

चैत्यवासिओं का प्रभुत्व

पूर्व काल में जैन श्रमण, लोगो से दूर वन्य स्थान, गुफाओं और निर्जन भूमिओं में साधना और विचरण करते थे. चातुर्मास की आराधना भी नगर के बहार उद्यानों में करते थे जिससे निर्मल और निर्दोष चारित्र धर्म का पालन हो सके. परन्तु समय की विषमता की वजह से श्रमण समुदाय को बहुत अड़चने होने लगी. श्रावक संघ से दुरी, लम्बे अकाल (सूखा), गोचरी की दुर्लभता, एवं वन्य स्थानों में जंगली जानवरो का भय, लोगो की अप्रीति आदि की वजह से श्रमण संघने ईस्वी की ५वी सदी से श्रावको की बस्ती, यानी नगरों में ही विचरण करना आरंभ कर दिया. नगर के जिनमंदिरो के आसपास उपाश्रयों अथवा श्रावको के घरों के निर्दोष स्थानों में श्रमण संघ ठहरने लगा. नगरादि स्थानों में रहने के बावजूद श्रमण संघ सतत विहारी रहते थे - एक स्थान में नहीं रहते थे. परन्तु समय के प्रवाह में इस मर्यादा में भी शिथिलता आई और ईस्वी की ८वी सदी तक बहुत श्रमणो ने चैत्यवास अपनाया जिसमे श्रमण जिनमंदिर और उपाश्रय में ही रहने लगे और इन स्थानों को अपना मठ बनाने लगे. एक समय पे सुवहित साधुओं से ज्यादा चैत्यवासी साधुओं का संख्याबल था.

ईस्वी की ८वी सदी में आचार्य श्री हरिभद्रसूरि, सम्बोध प्रकरण ग्रन्थ में चैत्यवासी साधुओं के बारे में लिखते हैं की वे आधाकर्मी आहार, सचित्त ग्रहण, तीन बार भोजन, विगई ग्रहण, पडिलेहण का त्याग, चैत्यवास (मंदिर/उपाश्रय आदि में निवास), देवद्रव्य भक्षण, हजामत और एकाकी परिभ्रमण आदि करते थे. पलंग, जोड़ा, वाहन, शस्त्र और धन आदि का परिग्रह रखते थे. ज्योतिष, मन्त्र-तंत्र, यज्ञ पूजा आदि से श्रावक वर्ग को भयभीत करते थे; नए मंदिर और उपाश्रयों का निर्माण करवाते थे. संसार सुख के लिए शास्त्रधार बिना की तपस्या, गलत अनुष्ठान, जिन प्रतिमा के रक्षण हेतु पूजा; चमत्कारिक प्रतिमाओं की भक्ति; पूजाविधि में कर्मकाण्ड, मृत व्यक्ति के लिए प्रभुपूजा -मृतद्रव्यग्रहण, पैसों के लिए आगम का व्याख्यान आदि करते थे.

आचार्य श्री हरिभद्रसूरिने सम्बोध प्रकरण में यह भी बताया है की अनेक चैत्यवासी साधु ऐसा भी बताते थे की श्रावको के पास आगम ग्रंथो के सूक्ष्म विचार नहीं कहने चाहिए[7]. इन सभी संदर्भो के आधार पर अनेक संशोधक[8] यह मानते हैं की जैसे ब्राह्मणो ने वेदों का अधिकार खुद के पास रखा था और दुसरो को अनाधिकारी बना कर अपनी सत्ता को कायम रखा था, वैसे ही चैत्यवासी साधुओं ने आगम पढ़ने का अधिकार खुद के पास रखा था और श्रावक श्राविकाओं को अनाधिकारी ठहराया था. यदि चैत्यवासी-साधु, श्रावको को आगम पढ़ने और अभ्यास करने की अनुमति देते तो उनके (चैत्यवासी) द्वारा आगम ग्रंथो को पढ़ कर धन कमाने का रास्ता बंद हो जाता. तदुपरांत आगम ग्रंथो के अभ्यास करने के बाद श्रावक उनके शिथिलाचार का भी तीव्र विरोध करते. इन्ही सब कारणों से ऐसा माना जा सकता है की गृहस्थों को आगम ग्रंथो का अभ्यास करने से रोकने का बीज चैत्यवासिओ ने बोया था.

गृहस्थ, आगम अभ्यास के अधिकारी - भाषा और शास्त्रीय दृष्टि

वैदिक संस्कृति का साहित्य (वेद) संस्कृत भाषा में था और उन ग्रंथो का प्रभुत्व मात्र ब्राह्मणो के पास था. संस्कृत जैसी प्रौढ़ भाषा को छोड़ कर प्रभु महावीर अर्धमागधी प्राकृत में देशना देते थे और गणधरो ने भी आगमों की रचना इसी भाषा में की थी - उसका एक ही कारण था की वह जन-सामान्य की भाषा थी. संस्कृत को छोड़ कर अर्धमागधी प्राकृत में ११ अंग आगमो की रचना इसीलिए की गई क्योंकि सामान्य व्यक्ति भी प्रभु की वाणी को सरलता से समझ सके. इस बात का प्रमाण हमें श्री दशवैकालिक सूत्र की टिका, धर्मबिंदु वृत्ति और पूज्य श्री आत्मारामजी महाराज (आचार्य श्री विजयानंदसूरीश्वरजी महाराज) के तत्त्वनिर्णयप्रासाद ग्रन्थ में मिलता है -

"बाल-स्त्री-मूढ-मूर्खाणां-नृणां चारित्रकाङ्क्षिणाम्, अनुग्रहार्थ सर्वज्ञैः सिद्धान्तः प्राकृतः कृतः"
- दशवैकालिक टीका तथा धर्मबिंदु वृत्ति

"बाल-स्त्री-वृद्ध-मूर्खाणां नृणां चारित्रकाङ्क्षिणाम्, उच्चारणाय तत्त्वज्ञैः सिद्धान्तः प्राकृतः कृतः"
- तत्त्वनिर्णयप्रासाद

अर्थात् - बालक, स्त्री, वृद्ध और मुर्ख (आबालगोपाल) चारित्र के आकांक्षा वाले व्यक्ति बिना प्रयास के प्रभु के वचनो का उच्चारण कर सके और अच्छी तरह समझ सके इसी के आशाय से प्रभु वचनो (सिद्धांतो) को प्राकृत जैसी सरल और सर्वदेशीय भाषा में रचा गया.

यदि प्रभु वचनो (सिद्धांतो) के उच्चारण और अभ्यास का अधिकार मात्र साधुओ का होता तो यह श्लोक की आवश्यकता ही नहीं होती. इसका और स्पष्टीकरण हमें पूज्य आचार्य श्री प्रभाचंद्रसूरीश्वरजी महाराज रचित श्री प्रभावक चरित्र में भी प्राप्त होता है जिसमे उन्होंने बताया है की १४ पूर्व संस्कृत में थे जो कालक्रम में विछिन्न हुए; वर्तमान में श्री सुधर्मास्वामी भाषित ११ अंग सूत्र है जिसका लाभ बालक, स्त्री, मूढ़ और मुर्ख आदि भी ले पाए वैसी अनुग्रहवती बुद्धि से प्राकृत में रचे गए हैं.

“चतुर्दशाऽपि पूर्वाणि संस्कृतानि पुराऽभवन्,
प्रज्ञातिशयसाध्यानि तान्युच्छिन्नानि कालतः, गयस्ति सुधर्मस्वामि भाषिता”
- प्रभावक चरित्र

तत्त्वनिर्णयप्रासाद में भी बताया गया है की दृष्टिवाद को छोड़ कर स्त्री और बालको के वांचनार्थ जिनेश्वर भगवंत ने अंग सिद्धांतो (आगमों) को प्राकृत में कहे हैं.

“यत उक्तमागमे - मुत्तूंण दिहिवायं कालिय-उक्कालियंगसिद्धतं, थी-बाल-वायणत्थं पाइममुइयं जिणवरेहिं”
- तत्त्वनिर्णयप्रासाद

श्री विशेषावशयक भाष्य में एक प्रश्न के रूप में पूछा गया है की यदि १२ अंग आगमों का सार दृष्टिवाद में आ जाता हो तो फिर ११ अंगो की अलग रचना की आवश्यकता क्यों हुई? इसके समाधान में श्री जिनभद्रगणी क्षमाश्रमण बताते हैं की - "यूं तो दृष्टिवाद में समस्त वाङ्गमय का समावेश होता है परन्तु जो लोग दुर्मेधस हैं (जिनमे दृष्टिवाद को समझने की क्षमता नहीं है और श्रावकादिगण) और स्त्रियों के लिए बाकी के ११ अंग और अंगबाह्य आगमों की रचना हुई है".

"तेषु च निश्शेषमपि वाङ्मयमवतरति, अतश्चतुर्दशपूर्वात्मकं द्वादशमेवाङ्गमस्तु, किं शेषाङ्गविरचनेन, अङ्गबाह्यश्रुतरचनेन वा?
तत्र यद्यपि दृष्टिवादे सर्वस्याऽपि वाङ्मयस्याऽवतारोऽस्ति, तथापि दुर्मेधसां तदवधारणाद्ययोग्यानां मन्दमतीनां, तथा श्रावकादीनां स्त्रीणां चानुग्रहाय नियूहणा विरचना शेषश्रुतस्येति”
- श्री विशेषावशयक भाष्य

जिनभद्रगणी क्षमाश्रमण इसी ग्रन्थ की टिका में बताते हैं की दृष्टिवाद में समस्त वाङ्मय का अवतार हो जाता है फिर भी मंदमति पुरुषों एवं स्त्रियों के लिए ग्यारह अंगों की रचना की गई.

“जइ वि य भूयावाए सव्वस्स वओमयस्स ओयारो। निज्जूहणा तहावि हुदुम्मेहे पप्पइत्थीय॥“
- श्री विशेषावश्यकभाष्य टिका

किसी भी गणधर भगवंत रचित अंग आगम में श्रावक-श्राविकाओं को आगम अभ्यास से वर्जित करने का विवरण प्राप्त नहीं होता और अनेक ग्रंथो का अध्ययन करने के पश्चात ऐसा आभास होता है की सामान्य श्रावक-श्राविका पूर्व काल में पवित्र आगमों का अभ्यास करते थे. जैसे हमने पहले भी बताया की आगमों को ईस्वी की पांचवी सदी तक लिपिबद्ध (पुस्तकारुढ़) नहीं किया गया था और प्रभु द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत यानी आगम शास्त्र स्मृति द्वारा ही सुरक्षित रखे जाते थे. उस समय श्रावकगण प्रभु की देशना सुनते या श्रमणो के पास से ग्रहण करते और उसे कंठस्थ रखते. अंग आगम श्री उपासकदशांग सूत्र में प्रभु श्री महावीर के १० उपासको (श्रावको) का चरित्र वर्णन है. श्री समवायांग सूत्र में जहां श्री उपासकदशांग सूत्र के विषय का उल्लेख आता है वहां श्रावको के श्रुतपरिग्रहा-श्रुताभ्यास का भी वर्णन आता है - अर्थात् श्रावकगण प्रभु श्री महावीर द्वारा वर्णित श्रुत का अभ्यास करते थे[9] (नन्दिसूत्र में आगमों के लिए 'श्रुत' शब्द का प्रयोग है)–

“से किं तं उवासगदसातो? उवासगदसासु णं उवासयाणं णगराइं, उज्जाणाइं, चेतियाई, वणसंडा, रायाणो, अम्मापितरो, समोसरणाइं, धम्मायरिया, धम्मकहाओ, इहलोइया पारलोइया इड्डिविसेसा, उवासयाणं च सीलव्वयवेरमणगुणपच्चक्खाणपोसहोववास पडिवजणतातो, सुयपरिग्गहा, तवोवहाणाई, पडिमातो, उवसग्गा, संलेहणातो, भत्तपच्चक्खाणाई, पाओवगमणाई, देवलोगगमणाई, सुकुलपच्चाया ती, पुण बोहिलाभो, अंतकिरियातो य आघविजंति।“ 
- श्री समवायांग सूत्र

श्री ठाणांग सूत्र (श्री स्थानांग सूत्र) में श्रुत और चारित्रको लेकर एक चौभंगी कही गई है - "सुय सम्पन्ने नाम मेगे नो चरित्तसम्पन्ने

अर्थात् - कोई पुरुष श्रुत सम्पन्न होते हैं चारित्र सम्पन्न नहीं होते, कोई चारित्र सम्पन्न होते हैं श्रुत सम्पन्न नहीं होते, कोई चारित्र और श्रुत उपय सम्पन्न होते हैं, कोई न श्रुत सम्पन्न होते हैं और न चारित्र सम्पन्न होते हैं. यहां चारित्र रहित पुरुषको श्रुत सम्पन्न कहा है. यदि साधुसे इतरको शास्त्र पढ़नेका अधिकार ही नहीं है तो चारित्र रहित पुरुष श्रुत सम्पन्न कैसे हो सकता है ? 

श्री भगवती शतक में यह पाठ आया है - "सुयसम्पन्ने नाम मेगे नो सोलसम्पन्ने" इस पाठमें शील रहितको श्रुत सम्पन्न होना कहा है. यदि श्रावकों को शास्त्र पढ़नेका अधिकार नहीं है तो शील रहित पुरुष श्रुतसम्पन्न कैसे हो सकता है ?  अतः श्रावकों को भी श्रुत, अर्थात् आगम अभ्यास करने का अधिकार है. 

इसके उपरांत श्री स्थानांग सूत्र की टिका में सूत्र पढ़ने के अन्य कारणो के साथ 'उपग्रह' का भी कारण बताया है. टीकाकार बताते हैं की जो आहार, पानी और वस्त्र आदि उत्पन्न करने में समर्थ है (अर्थात् गृहस्थ) उनको सूत्र पढ़ा कर उपगृहीत (आभारी) करना चाहिए-

“एवम्-उपग्रहार्थाय-उपग्रहार्थतया वा-एवं हि एते भक्त-पान-वस्त्राद्युत्पादनसमर्थतया उपष्टम्भिता भवन्तु इति भावः”
- श्री स्थानांग सूत्र टिका

जैसे हमने पहले भी देखा की श्री सम्बोध प्रकरण में आचार्य श्री हरिभद्रसूरीश्वरजी महाराज बताते हैं की चैत्यवासी काल में कुछ साधुओं का ऐसा मानना था की साधुओं को श्रावको के पास आगम ग्रंथो के सूक्ष्म विचार नहीं कहने चाहिए. इस बात की अयुक्तता बताते हुए आचार्यश्री फरमाते हैं की अंग सूत्रों (आगमो) में श्रावको के बारे में ऐसा वर्णन आता है की वे लब्धार्थ, गृहितार्थ, पुष्टार्थ, विनिश्वतार्थ, जिवाजिव के जानकार और प्रवचन से अचालनीय हैं. इसीलिए वे सूक्ष्म विचारों को जानने के भी अधिकारी हैं.

"केइ भणंति उ भण्णइ सुहुमवियारो न सावगाण पुरो, तं न, जओ अंगाइसु सुब्बइ तव्वन्नणा एवं,
लहा, गहियठा, पुच्छियटा विणिच्छियष्ठा य, अहिगयजीयाजीवा अचालणिज्जा पवयणाओ"
- श्री सम्बोध प्रकरण

इन सभी उल्लेखों से हम अनुमान लगा सकते हैं की पूर्व काल में आगमों के अभ्यास का अधिकार गृहस्थों के पास भी था, परन्तु कालांतर (प्रायः चैत्यवासी-मध्यकाल में) में उन्हें अनाधिकारी बना दिया गया.

योगोद्वहन - आगमकालीन या मध्यकालीन?

योगोद्वहन का शाब्दिक अर्थ है- योग + उद्वहन. तीन योगों की एकाग्रतापूर्वक एवं विशिष्ट तप की साधना पूर्वक श्रमणो द्वारा आगम सूत्रों का जो अध्ययन किया जाता है वह योगोद्वहन कहलाता है. श्वेताम्बर मूर्तिपूजक, तेरापंथी और स्थानकवासी तीनों ही परम्पराओं ने अंग आगमों के अध्ययन के लिए योगोद्वहन को आवश्यक माना है किन्तु स्थानकवासी एवं तेरापंथी परम्परा योगोद्वहन का अर्थ मन, वचन और काया की प्रवृत्ति को सम्यक दिशा में नियोजित करना इतना ही मानती है; जबकि श्वेताम्बर मूर्तिपूजक परम्परा में योगेद्वहन एक विशेष प्रक्रिया मानी गई है.

प्रत्येक आगम के अध्ययन हेतु विशेष प्रकार के योग करवाए जाते हैं. अंग आगमों का अध्ययन किस क्रम एवं किन तपों के साथ होना चाहिए इसका उल्लेख किसी भी अंग आगम में प्राप्त नहीं होता. परन्तु, अन्य मध्यकालीन ग्रन्थ जैसे सामाचारी संग्रह, प्राचीन सामाचारी, तिलकाचार्य सामाचारी, सुबोधा सामाचारी, विधिमार्गप्रपा एवं आचारदिनकर आदि में योगेद्वहन की विस्तृत जानकारी उपलब्ध होती है. अंग आगमों के साथ-साथ उत्तराध्ययन, दशवैकालिक आदि प्रमुख आगम ग्रन्थों की भी योग विधि उसमें दी गई है. यहाँ योगोद्वहन की यह विधि मुख्य रूप से उपवास, एकासण, नीवी आदि तपों से जोड़ी गई है. क्रम से और प्रतिदिन कितना करवाना चाहिए इसका भी उल्लेख है.

योगोद्वहन शब्द का अर्थ मन, वचन और काया की प्रवृत्ति को सन्मार्ग में नियोजित करना होता है किन्तु ये प्रवृत्तियाँ सन्मार्ग में नियोजित रहें, इस हेतु इन्द्रियों एवं मन को संयमित करना आवश्यक है. इसके लिए इस क्रिया में तप के साथ जप, स्तवन, स्तुति, वंदन आदि को भी जोड़ा गया है और यह माना जाता है कि आचार्य आदि जिनके सानिध्य में आगमों का अध्ययन करना होता है उनके प्रति विनय का प्रदर्शन आवश्यक है. आगमों में जितने अध्ययन और उद्देशक होते हैं तदनुसार खमासमण, वंदन, कायोत्सर्ग आदि की क्रियाएँ की जाती है. आगम आकार में जितना बड़ा होता है उसकी योगोद्वहन विधि भी क्रमश: उतनी ही बढ़ती जाती है. कुछ ग्रन्थों के योगोद्वहन साथ-साथ भी करवाए जाते हैं.

वर्तमान परम्परा में साध्वी को सभी आगम सूत्रों के अध्ययन-योगोद्वहन करने का अधिकारी नहीं माना गया है किन्तु जब आगमसूत्रों का गहराई से अध्ययन करते हैं तो श्री अंतकृतदशांग सूत्र में यक्षिणी आर्या के सान्निध्य में पद्मावती आदि तथा चन्दना आर्या के सान्निध्य में काली आदि के द्वारा ११अंगों के अध्ययन करने का उल्लेख किया गया है. इसी प्रकार श्री ज्ञाताधर्मकथा सूत्रमें सुव्रता आर्या के सान्निध्य में द्रौपदी द्वारा ११ अंगों के अध्ययन करने का सूचन है.

दीक्षा अंगीकार करने के पश्चात मुनि को आगम ग्रन्थों का योगोद्वहन एवं उसका वाचन कब करना चाहिए? यदि इस सन्दर्भ में पर्यावलोकन करें तो श्री व्यवहार सूत्र में इसकी चर्चा करते हए बतलाया गया है कि तीन वर्ष की दीक्षा पर्याय वाले श्रमण को आचारांगसूत्र, चार वर्ष की दीक्षा पर्याय वाले श्रमण को सूत्रकृतांगसूत्र, पाँच वर्ष की दीक्षा पर्याय वाले श्रमण को दशाश्रुत, बृहत्कल्प, व्यवहारसूत्र, आठ वर्ष की दीक्षा पर्याय वाले श्रमण को स्थानांग और समवायांगसूत्र, दस वर्ष की दीक्षा पर्याय वाले श्रमण को भगवती सूत्र, (ग्यारह वर्ष से ठारह वर्ष की दीक्षा पर्याय वाले अन्य ग्रन्थ), उन्नीस वर्ष की दीक्षा पर्याय वाले श्रमण को दृष्टिवाद नामक बारहवाँ अंग तथा बीस वर्ष की दीक्षा पर्याय वाला श्रमण सर्वश्रुत को धारण कर सकता है. अर्थात बीस वर्ष की दीक्षा पर्याय होने के बाद तो सभी आगम-सूत्र पढ़े जा सकते हैं.

परन्तु यदि पूर्व के महापुरुषों और आर्याओं द्वारा आगम अध्ययन की चर्चा करें तो हम देख पाएंगे की ६ महीने से ले कर १२ वर्ष के अंदर ही अनेक मुनिओं ने अपनी आगम साधना को पूर्ण किया जिसका विस्तार निचे के कोष्ठक में बताया है–


उपधान करने के द्वारा सूत्रों का अधिकार लेने का उल्लेख मात्र श्री महानिशीथ सूत्र में प्राप्त होता है जो अंग-बाह्य आगम होने के साथ-साथ एक मध्यकालीन रचना है. यह सूत्र सर्व गच्छ में मान्य नहीं है और प्राचीन आचार्यों में भी इस सूत्र की प्रमाणिकता को ले कर मतभेद है. श्री महानिशीथ सूत्र के कर्ता ने भी अपने ग्रन्थमें बताया है की इस ग्रन्थ में कम-ज्यादा लिखा हुआ है उसका दोष श्रुतधरो को उन्हें नहीं देना चाहिए क्योंकि ग्रन्थ का एक बड़े हिस्से का नाश हुआ है. इस ग्रन्थ के चतुर्थ अध्ययन के अंत में लिखा है अनेक सिद्धांत माननारे पुरुषों को कुछ आलावो पर सम्यक् श्रद्धा नहीं है. इसीलिए इन सब बातों को देख कर इस ग्रन्थ की प्रमाणिकता पर संदेह अवश्य होता है. 

अंग आगमो में ऐसा कोई उल्लेख प्राप्त नहीं होता जिसमे किसी श्रमण ने वर्तमान में प्रचलित योगोद्वहन की विधि कर के सूत्र ग्रहण किए हो. 
इसीलिए इन दृष्टांतो को देख कर हम समझ सकते हैं की दीक्षा पर्याय के अनुसार आगम सूत्र पढ़ने का अधिकार अर्वाचीन है जिसकी शुरुआत शिथिलाचारी (प्रायः चैत्यवासी) साधुओ के अनुशाशन लिए की गई होगी.  

गृहस्थों द्वारा आगम अभ्यास न करने के स्पष्ट उल्लेख हमें श्री आवश्यकसूत्र, श्री निशीथ सूत्र, श्री प्रश्नव्याकरण सूत्र, महोपाध्याय श्री यशोविजयजी रचित श्री वीर प्रभु के १५० गाथा का स्तवन आदि मध्यकालीन और उत्तरकालीन ग्रंथो में पाए जाते हैं. मध्य और उत्तरकालीन समय के गृहस्थों में सात्विकता और गुणवत्ता की कमी की वजह से यह नियम बनाए गए होंगे ऐसा मेरा मानना है.

उपसंहार

इस सम्पूर्ण चर्चा से हम समझ सकते हैं की प्राचीन काल में गृहस्थों द्वारा आगमो का अध्ययन किया जाता था परन्तु कालांतर में श्रावक-श्राविकाओं में सात्विकता, प्रमाणिकता और गुणवत्ता की कमी और चैत्यवासी साधुओं के प्रभुत्व की वजह से गृहस्थों को आगम अभ्यास का अनाधिकारी बना दिया. योगोद्वहन एवं उपधानादि क्रियाओं द्वारा सूत्र अधिकार प्राप्त करने की विधि भी मध्यकालीन है; मन, वचन और काया की प्रवृत्ति को सन्मार्ग में नियोजित करने के लिए, इन्द्रियों एवं मन को संयमित करने के लिए और सूत्रों के प्रति विनय का प्रदर्शन के लिए यह क्रियाओं का उद्भव हुआ है.

वर्तमान समय में गृहस्थों द्वारा आगम अभ्यास करने के फायदे और नुकसान दोनों ही है. वर्तमान में जितने भी धर्म-क्रियाओं और सिद्धांतो में फैली हुई विकृतिओं को ले कर संप्रदाय-गच्छ-समुदाय में मतभेद हैं वे अंग आगमो के अभ्यास से कम हो सकते हैं. श्री उत्तराध्ययन सूत्र में एक अद्भुत पंक्ति है - “अप्पणा सच्चमेसेज्जा”. अर्थात् - अपने द्वारा और अपने चिंतन मनन के द्वारा सत्य की खोज करनी चाहिए. यह कथन आगम अभ्यास की बात को समर्थन देता है. परन्तु यह भी प्रश्न उठता है की क्या वर्तमान में ऐसे सात्विक और गुणवान गृहस्थ है जो आगम श्रुतग्रहण के लायक है? अविनयी, असंयमी, पूर्वाग्रह और परिग्रहयुक्त गृहस्थ द्वारा आगम अभ्यास उतना ही शासन को नुकसानकारी बन सकता है.

मेरा मानना है की चुनिंदा पाठ (विशेषतः जो मात्र साधुओं के आचार आदि या गोपनीय रखने योग्य हो) उनको छोड़ कर बाकी अंग आगम के श्रुत का अभ्यास श्रावको द्वारा अवश्य करना चाहिए जो उनके मोक्ष मार्ग के लिए सहायक बन सकता है. मानता हूँ की अंग आगमो को छोड़ कर जैन धर्म में विशाल ज्ञानसमुद्र है - परन्तु यह बात भी उतनी ही ज़रूरी है की मात्र अंग आगम ही मात्र वह धरोहर है जो तीर्थंकर प्रभु की अपरोक्ष (और किसी भी विकृति -मिलावट से मुक्त) वाणी है. गीतार्थ गुरुभगवन्तों द्वारा इस विषय पर गृहस्थों के उत्थान के लिए एक विमर्श अवश्य करना चाहिए. 

जिनाज्ञा विरुद्ध कुछ भी लिखा गया हो तो मिच्छामि दुक्कडम्.

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पादटीका

[1] तीन योगों की एकाग्रतापूर्वक एवं विशिष्ट तप की साधना पूर्वक श्रमणो द्वारा आगम सूत्रों का जो अध्ययन किया जाता है वह योगोद्वहन कहलाता है.

[2] श्री महानिशीथ सूत्र के अनुसार निम्नलिखित सूत्रों को पढ़ने का अधिकार प्राप्त करने के लिए उपधान तप अनिवार्य है -पंचमंगल महाश्रुतस्कंध (नवकार), प्रतिक्रमण श्रुतस्कंध (इरियवही, तस्स उतरी), शक्रस्तवाध्ययन (नमुत्थुणं), चैत्यस्तवाध्ययन (अरिहंत चेइयाणं, अन्नत्थ), नामस्तवाध्ययन (लोगस्स), श्रुतस्तव सिद्धस्तवाध्ययन (पुक्खरवरदी, सिद्धाणं बुद्धाणं)

[3] अंग आगम: आयारंग, सूयगडं, ठाणांग, समवायांग, भगवती, नायाधम्मकहा, उवासगदसा, अंतगडदसा, अनुत्तरोववाइयदसा, पण्हवागरण, विवागसुय, दिठ्ठवाय.

[4] अंगबाह्य आगम- (1) उपांग आगम: ओवाइय, रायपसेणिय, जीवाभिगम, पन्नवणा, सूरियपन्नति, जम्बुद्दीवपन्नति, निरयावलि, कप्पवडंसिया, पुप्फिया, पुप्फचूलिया, वण्हिदसा. (2) पइन्ना: चउसरण, आउरपचक्खाण, भत्तपरिन्ना, संथर, तंदुलवेयालिय, चंदविज्झय, देविंदत्थव, गणिविज्जा, महापंचक्खाण, वोरत्थव. (3) छेदसूत्र: निसीह, महानिसीह, ववहार, आचारदसा, कप्प (बृहत्कल्प), पंचकप्प. (4) मूलसूत्र: उत्तरज्झयण, आवस्सय, दसवेयालिय, पिंडनिज्जुति, नंदि और अनुयोग.

[5] आवश्यकनियुक्ति में उल्लेख प्राप्त होता है कि "तप, नियम, ज्ञान रूप वृक्ष पर आरूढ होकर अनन्तज्ञानी केवली भगवान् भव्य आत्माओं के बोध के लिए ज्ञान कुसुमों की वृष्टि करते हैं. गणधर अपने बुद्धिपटल में उन सभी कुसुमों का अवतरण कर प्रवचन माला में गूंथते हैं.' इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जैन आगमों के कर्ता तीर्थंकर, गणधर एवं स्थविर हैं. अर्थ रूप से तीर्थंकर प्रणीत, सूत्र रूप से गणधर प्रणीत, चतुर्दशपूर्वी, दशपूर्वी एवं प्रत्येक बुद्ध द्वारा कथित वचन ही आगम कहे जा सकते हैं. जब दशपूर्वी नहीं रहे तब आगम की संख्या वृद्धि भी स्वत: स्थगित हो गई. यद्यपि श्वेताम्बर परम्परा में आगम रूप में मान्य कुछ प्रकीर्णक ऐसे भी हैं जो दशपूर्वो से कम ज्ञान वालों द्वारा रचित है फिर भी उनको आगम रूप में मान्यता प्राप्त है.

[6] जैन मुनि मन, वचन, काया द्वारा हिंसा न करने, हिंसा न करवाने एवं हिंसा की अनुमोदना न करने की प्रतिज्ञा का यावज्जीवन पालन करते हैं. श्री आचारांग सूत्र आदि ग्रन्थों के अध्ययन से स्पष्टतया ज्ञात हो जाता है कि साधु को उस तरह की वस्तु का निर्माण करने, करवाने या स्वीकारने का सर्वथा निषेध किया गया है जिसमें हिंसा की सम्भावना हो; जबकि शास्त्र का लेखन करना या करवाना प्रत्यक्षत: हिंसा जन्य है तथा इससे परिग्रह की वृद्धि भी होती है. श्री बृहत्कल्पसूत्र के अनुसार पुस्तक रखने वाले मुनि को प्रायश्चित्त आता है. ताड़पत्रों पर कुरेदकर अक्षर आदि लिखने से कुन्थु आदि त्रस जीवों की हिंसा होती है, इस तरह पुस्तक लेखन संयम विराधना का कारण है. श्री बृहत्कल्पभाष्य के अनुसार साधु जितनी बार पुस्तकों को बाँधते हैं, खोलते हैं और अक्षर लिखते हैं उन्हें उतने ही चतुर्लघुकों का प्रायश्चित्त आता है और आज्ञा विराधना आदि दोष लगते हैं

[7] “केइ भणंति उ भण्णइ सुहुमवियारो न सावगाण पुरो”

[8] पंडित बेचारदास जीवराज, डॉ. सागरमल जैन आदि

[9] Samavayangasuttam, Ashok Kumar Singh, Page 269

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