क्या भगवान महावीर ने पश्चिमी भारत में विहार किया था?


यह प्रश्न आज के जैन समाज में अत्यंत महत्त्वपूर्ण और गंभीर चिंतन का विषय है कि क्या भगवान महावीर स्वामी ने अपनी छद्मस्थ अवस्था में गुजरात और राजस्थान की भूमि पर विहार किया था? वर्तमान में यह धारणा इतनी व्यापक रूप से स्वीकार कर ली गई है कि उसके आधार पर अनेक तीर्थस्थानों की स्थापना हो चुकी है तथा पीढ़ियों से श्रद्धालुओं के बीच यह विश्वास पोषित होता रहा है।

किन्तु जब हम जैन आगमों (आचारांग सूत्र, व्याख्याप्रज्ञप्ति 
सूत्रकल्पसूत्र, आवश्यक निर्युक्ति -चूर्णि आदि) तथा कलिकालसर्वज्ञ आचार्य श्री हेमचन्द्रसूरि रचित श्री त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र जैसे प्रामाणिक ग्रंथों का तटस्थ और ऐतिहासिक दृष्टि से अध्ययन करते हैं, तो एक भिन्न ही चित्र हमारे सामने उभरता है। जैन आगमों में भगवान महावीर के संपूर्ण विहार-क्रम का अत्यंत विस्तृत और वर्षवार विवरण उपलब्ध है। किस वर्ष भगवान ने किस नगर, ग्राम आदि में चातुर्मास किया, कहाँ-कहाँ विहार किया; इन सबका क्रमबद्ध उल्लेख ग्रंथों में मिलता है। विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इन विहार-स्थलों में वर्णित अधिकांश स्थानों की पहचान आधुनिक इतिहासकारों और शोधकर्ताओं द्वारा सफलतापूर्वक की जा चुकी है।

इन प्रामाणिक स्रोतों में उल्लिखित भगवान महावीर की समस्त विहार-भूमियाँ अंग, मगध, विदेह, वज्जि, मल्ल, काशी, कौशल, कलिंग आदि प्राचीन जनपदों और राज्यों में स्थित हैं, जो वर्तमान में मुख्यतः बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा तथा उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में आते हैं। इसके विपरीत, प्राचीन आगमिक साहित्य में गुजरात, राजस्थान अथवा पश्चिमी भारत के किसी भी स्थान का उल्लेख भगवान महावीर की विचरण-भूमि के रूप में प्राप्त नहीं होता। (सम्पूर्ण सूचि के लिए देखें परिशिष्ठ १)

ऐसी स्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि वर्तमान में प्रचलित मान्यताओं, परम्पराओं और स्थानीय दावों की शास्त्रीय एवं ऐतिहासिक प्रमाणों की कसौटी पर निष्पक्ष समीक्षा की जाए। श्रद्धा का अपना स्थान है, किन्तु इतिहास और आगमों के विषय में निष्कर्ष सदैव उपलब्ध प्रमाणों और प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर ही निकाले जाने चाहिए।

प्रचलित मान्यताएँ और उनका स्वरूप

प्रचलित धारणाओं के अनुसार गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले में वढवाण शहर के निकट भोगवा नदी के तट को भगवान के प्रथम वर्षावास की भूमि "अस्थिकग्राम" माना जाता है। एक अन्य श्वेतांबर समुदाय इसी स्थान की पहचान राजस्थान के खींवसर गाँव से करता है और वहाँ एक नवीन मंदिर भी स्थापित किया जा चुका है। इसी प्रकार राजस्थान के नांदिया को चंडकौशिक सर्प उपसर्ग की भूमि बताया जाता है, बामणवाड़ा को कान में कीलें ठोकने के उपसर्ग का स्थान माना जाता है, और राजस्थान के नाणा, दियाणा, मूंगथला जैसे ग्रामों को भगवान की विचरण-भूमि घोषित किया जाता है। इन सबके अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि भगवान ने शत्रुंजय (सिद्धाचलगिरि) की स्पर्शना की थी। इन सभी मान्यताओं की क्रमबद्ध रूप से परीक्षा करना इस लेख का उद्देश्य है।

प्रश्न १ - अस्थिकग्राम का वास्तविक स्थान: वढवाण, खींवसर या बर्धमान?

अस्थिकग्राम में शूलपाणि यक्ष द्वारा प्रभु पर उपसर्ग 


व्याख्याप्रज्ञप्ति (भगवतीसूत्र) में अस्थिकग्राम का पुराना नाम स्पष्ट रूप से "वर्धमान" बताया गया है। इस ग्रंथ में उसके पास "वेगवती" नाम की एक नदी का उल्लेख है, जिसे कीचड़युक्त और ऊँचे-नीचे गड्ढों से पूर्ण बताया गया है। जब हम इस वर्णन को गुजरात के वढवाण समीप की भोगवा नदी से मिलाते हैं तो स्पष्ट हो जाता है कि यह समानता निराधार है। भोगवा मूलतः वर्षाकाल में बहने वाला एक रेतीला नाला है — उसमें न कीचड़ की अधिकता है, न गड्ढों की वैसी विशेषता जिसे ग्रंथकार को लिपिबद्ध करने की आवश्यकता पड़े। अतः नदी के वर्णन के आधार पर अस्थिकग्राम को गुजरात में मानने का कोई शास्त्रीय आधार नहीं बनता।

एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि प्रथम वर्षावास से पूर्व भगवान जिन स्थानों में विहार करते हुए आए — क्षत्रियकुंड, ज्ञात-खंडवन, कर्मारग्राम, कोल्लागसन्निवेश, मोराकसन्निवेश — ये सभी स्थान पूर्व दिशा में हैं
 (सम्पूर्ण प्राचीन और अर्वाचीन नाम की सूचि के लिए देखें परिशिष्ठ -२ ) यदि भगवान इन स्थानों से विहार करते हुए गुजरात के वढवाण की ओर गए होते, तो उस सुदीर्घ मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थानों का उल्लेख ग्रंथों में अवश्य होता। परंतु क्षत्रियकुंड से वढवाण तक के किसी भी स्थान का नाम कहीं नहीं मिलता — यह मौन स्वयं एक प्रबल प्रमाण है। 

इस विषय में पू. श्री दर्शनविजयजी , ज्ञानविजयजी , न्यायविजयजी ने "जैन परम्परा नो इतिहास" पुस्तक में जो लिखा हैं वह उल्लेखनीय हैं -

“भगवान महावीर ने दीक्षा लेने के बाद अपना पहला चातुर्मास मोराक सन्निवेश और अस्थिकग्राम में किया। उस अस्थिकग्राम का वास्तविक नाम वर्धमाननगर था। वहाँ नदी के किनारे शूलपाणि यक्ष ने भगवान पर अनेक उपसर्ग किए, लेकिन अंत में थककर उन्होंने क्षमा माँगी और प्रभु की भक्ति-पूजा की। वहाँ एक जैन तीर्थ की स्थापना हुई थी, जो समय के प्रवाह में नष्ट हो गया। बाद में, जब शंकराचार्य के प्रभाव के कारण लोगों को पलायन करना पड़ा, तो वे मारवाड़ की ओर चले गए। वे अपने साथ जो प्रतिमाएँ आदि लाए थे, उन्हें उन्होंने विभिन्न स्थानों— नांदिया, दियाणा, लेटाणा, सांडेराव, नाणा, मुंडस्थल, बामणवाड़ा आदि में नए स्थापना तीर्थ बनाएं। इन तीर्थों की स्थापना अधिकतर निवृत्ति कुल के आचार्यों द्वारा की गई थी। इसी प्रकार विद्याधर गच्छ के आचार्यों ने भी विक्रम की ९वीं सदी में वढवाण आदि स्थानों पर स्थापना तीर्थ बनाएं। सर्वालगच्छ के चैत्यवासी आचार्य जनेश्वरसूरी ने विक्रम संवत 1173 के फाल्गुन वदी 4 को वढवाण में भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा की प्रतिष्ठा की। गुजरात के महामात्य उदयन का विक्रम संवत 1208 में सौराष्ट्र के वढवाण में शांतिपूर्वक देहांत हुआ। उनका अंतिम संस्कार वढवाण में भेगावा नदी के किनारे किया गया। इसके बाद उनके वंशजों और जैन संघ ने नदी के किनारे वर्धमान तीर्थ की पुनः स्थापना की। यहाँ एक देरी (छोटा मंदिर) बनाकर भगवान भगवान महावीर की चरणपादुका स्थापित की गई होगी। इसके बाद इस स्थान का कई बार जीर्णोद्धार (पुनर्निर्माण) किया गया। अंतिम जीर्णोद्धार वढवाण के जैन संघ द्वारा विक्रम की 19वीं सदी में किया गया।“

इससे यह स्पष्ट हो जाता हैं की वढवाण और नांदिया, दियाणा, लेटाणा, सांडेराव, नाणा, मुंडस्थल, बामणवाड़ा आदि सब स्थापना तीर्थ हैं और मूल विचरण भूमि नहीं हैं। 

इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल में आज भी बर्धमान जिला विद्यमान है। बंगाली भाषा में "व" का उच्चारण "ब" होता है, इसलिए "वर्धमान" का "बर्धमान" बनना स्वाभाविक भाषिक अपभ्रंश है। यह स्थान क्षत्रियकुण्ड, ज्ञातखण्डवन, कर्मारग्राम, कोल्लागसन्निवेश और मोराकसन्निवेश के पूर्वी क्षेत्र में अवस्थित है। आगमों में वर्णित भगवान महावीर के विहार-क्रम का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि इसकी स्थिति उनके विचरण-पथ (विहार मार्ग) के अनुरूप है। इस प्रकार भौगोलिक एवं आगमिक दोनों दृष्टियों से यह पहचान पर्याप्त रूप से संगत एवं तर्कसंगत प्रतीत होती है। इस बर्धमान के बर्ध गाँव में आज भी सात देउल जैन मंदिरों के अवशेष हैं, और वहाँ शूलपाणि यक्ष को "शूलपाणि शिव" के नाम से पूजा जाता है — जो शूलपाणि उपसर्ग की ऐतिहासिक स्मृति को जीवित रखता है। सबसे निर्णायक तथ्य यह है कि इस क्षेत्र में दामोदर नदी बहती है,  जो शास्त्रोक्त "वेगवती" के वर्णन से पूरी तरह मेल खाता है। भौगोलिक मार्ग, नाम की समानता, नदी का वर्णन और प्राचीन अवशेष — सभी दृष्टियों से बर्धमान ही अस्थिकग्राम का वास्तविक स्थान प्रतीत होता है।

पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले में सात देउल जैन मंदिर के अवशेष 


प्रश्न २ - चंडकौशिक उपसर्ग: नांदिया (राजस्थान) या उष्का (बीरभूम, बंगाल)?

चंडकौशिक द्वारा उपसर्ग 


प्रथम वर्षावास के बाद दूसरे वर्षावास से पूर्व के विहार-क्रम में कनकखल आश्रम का उल्लेख है, जहाँ भगवान ने चंडकौशिक सर्प को उपदेश दिया था। इस स्थान को राजस्थान के नांदिया से जोड़ा जाता है। परंतु आवश्यकचूर्णि का कथन है कि कनकखल आश्रम और श्वेताम्बिका नगरी एक-दूसरे के निकट हैं। इस कसौटी पर नांदिया पूर्णतः अनुत्तीर्ण हो जाता है, क्योंकि नांदिया से श्वेताम्बिका की दूरी लगभग दो हजार किलोमीटर है — यह "निकट" किसी भी दृष्टि से नहीं कहा जा सकता।

शास्त्रों में वर्णित भगवान का विहार-क्रम और भी स्पष्ट करता है। भगवान अस्थिकग्राम से मोराकसन्निवेश गए, फिर दक्षिण वाचाला, सुवर्णबालुका नदी, रुप्यबालुका नदी होते हुए कनकखल आश्रम पहुँचे। वढवाण से नांदिया की दिशा में चलने पर मार्ग में इन नामों का कोई स्थान नहीं मिलता, कोई ऐसी नदी नहीं पड़ती जिसका उल्लेख करना ग्रंथकार को आवश्यक लगता। यदि मान भी लें कि भगवान नांदिया से मल्लदेश होते हुए नालंदा (दूसरा वर्षावास) गए, तो इस मार्ग में गंगा नदी को कई बार पार करना होता। परंतु विहार-क्रम में गंगा पार करने का उल्लेख केवल एक बार है — यह तथ्य नांदिया की परिकल्पना को पूरी तरह असंगत सिद्ध करता है। 


(सम्पूर्ण प्राचीन और अर्वाचीन नाम की सूचि के लिए देखें परिशिष्ठ -२ )

इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में आज भी उष्का ग्राम है। कनकखल आश्रम में कौशिकों का निवास होने के कारण इस ग्राम का पुराना नाम "कौशिक" था, जो अपभ्रंश होकर "उष्का" बना। उष्का के बाहर एक छोटा टीला है जिसे "जोगी पहाड़ी" कहते हैं। आज भी आसपास के ग्रामवासियों में यह परंपरा जीवित है कि यहाँ किसी "जोगी बाबा" ने एक सर्प को उपदेश दिया था — यह लोक-स्मृति भगवान महावीर और चंडकौशिक की कथा की अनुगूँज है। स्वयं श्वेताम्बिका नगरी की पहचान उष्का के निकट सैंथिया (बीरभूम) से की जाती है, जो "निकट" की शास्त्रोक्त कसौटी पर खरी उतरती है (मात्र १८ किलोमीटर दूर)
यह भी उल्लेखनीय है कि प्राचीन ग्रंथों के अनुसार प्रदेशी राजा ने भगवान महावीर के विहार के स्मरण में वज्रभूमि का नाम "वीरभूमि" रखा, जो बंगाली उच्चारण से "बीरभूम" बन गया — यह नामसाक्ष्य भगवान की इस भूमि में उपस्थिति की पुरानी स्वीकृति है।

उष्का जोगी पहाड़ी स्थित प्रभु महावीर के चरण चिह्न और वृक्ष 


प्रश्न ३ - खिले ठोकने का उपसर्ग: बामणवाड़ा (राजस्थान) या छम्मन (बिहार)?

कल्पसूत्र आगम के अनुसार भगवान ने बारहवाँ चातुर्मास चंपा में पूर्ण किया, तत्पश्चात् विहार करते हुए छम्माणि ग्राम पहुँचे जहाँ एक ग्वाले ने उनके कानों में ग्वाले ने कीलें ठोंक दीं। वहाँ से वे सीधे पावापुरी गए जहाँ कीलें निकाली गईं। चंपा और पावापुरी — दोनों बिहार में हैं, और शास्त्र स्पष्ट कहता है कि छम्माणि से भगवान सीधे पावा गए, बीच में कोई अन्य स्थान नहीं आया।

अब यदि बामणवाड़ा को छम्माणि मानें, तो चंपा से बामणवाड़ा की दूरी लगभग सत्रह सौ किलोमीटर और बामणवाड़ा से पावापुरी की दूरी लगभग सोलह सौ किलोमीटर बनती है। अर्थात् कानों में कीलें गड़ी होने की अत्यंत पीड़ादायी अवस्था में भगवान को तीन हजार किलोमीटर से भी अधिक का विहार करना होता! यह तार्किक दृष्टि से असंभव है। इसके अतिरिक्त, बारहवें चातुर्मास के बाद के भी सभी विहार-स्थल पूर्व दिशा में हैं; छम्माणि के पूर्वापर स्थान भी पूर्व में ही हैं। इसलिए विहार-क्रम की दृष्टि से भी 
बामणवाड़ा की ओर जाना संभव नहीं।

ग्वाले द्वारा प्रभु पर उपसर्ग और निवारण 


एक और विचारणीय बात यह है कि बामणवाड़ा में एक दरार वाली शिला रखी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह भगवान की पीड़ा की चीख से फटी। परंतु मान्यता अनुसार वह चीख खिले निकालते वक्त , अर्थात् पावापुरी में आई थी, छम्माणी में नहीं। तब प्रश्न उठता है — क्या बामणवाड़ा छम्माणि है या पावा? यह अंतर्विरोध स्वयं इस मान्यता की निराधारता सिद्ध करता है।

गहन शोध के आधार पर बिहार शरीफ (नालंदा) के निकट "छम्मन" नामक ग्राम को ही छम्माणि माना जाता है, जो चंपा और पावापुरी दोनों के मध्यवर्ती मार्ग में स्थित है। यह स्थान पावापुरी से मात्र १३ किलोमीटर दूर हैं।

प्रश्न ४ - शत्रुंजय यात्रा: क्या आगम-ग्रंथों में इसका उल्लेख है?

यह कहा जाता है कि भगवान ने चौथे और पाँचवें चातुर्मास के बीच सिद्धाचलगिरि (शत्रुंजय) की तीर्थयात्रा की थी, और केवलज्ञान के बाद उनका समवसरण वहाँ रचा गया था। इसकी पुष्टि के लिए श्री वीरविजय जी का यह पद उद्धृत किया जाता है — "नेमि विना त्रेविश प्रभु, आव्या विमल गिरींद।" यह पद शत्रुंजय माहात्म्य पर आधारित है, जिसके रचयिता श्री घनेश्वरसूरि हैं और जिसका रचनाकाल विक्रम संवत् की तेरहवीं शताब्दी है।

यहाँ एक मूलभूत प्रश्न उठता है: जब इस ग्रंथ से भी अधिक प्राचीन समस्त आगम-ग्रंथों और कलिकालसर्वज्ञ आचार्य श्री हेमचंद्र रचित त्रिषष्टिशलाकापुरुष चरित्र में भगवान की विहार-भूमियों की जो सूची है उसमें सिद्धाचलगिरि का नाम कहीं नहीं आता, तो परवर्ती एक ग्रंथ के आधार पर इसे कैसे स्वीकार किया जाए? यह वैसे ही है जैसे किसी पुराने तथ्य के लिए बाद के साक्ष्य को पहले के मौन पर प्राथमिकता दी जाए।

चौथे और पाँचवें चातुर्मास के बीच के विहार-स्थलों की सूची देखें — पृष्ठचम्पा, कयंगला, श्रावस्ती, इलिद्रुग, नंगला, आवत्ता, चोरायसन्निवेश, कलंजुकासन्निवेश, राढभूमि (लाढ), पूर्णकलश और भद्दिया — इनमें से कोई भी स्थान गुजरात या मारवाड़ की दिशा में नहीं है, सभी पूर्व में हैं। यदि इस सूची के अतिरिक्त पृष्ठचम्पा से सिरोही होते हुए पालीताना (शत्रुंजय) तक का आने-जाने का मार्ग जोड़ें तो साढ़े तीन हजार मील से भी अधिक का विहार बनता है। यह परिकल्पना तर्कसंगत नहीं है।

प्रश्न ५ - "जीवितस्वामी" प्रतिमाएँ: शब्द का अर्थ और मूर्तियों की वास्तविकता

नाणा, दियाणा, नांदिया और ब्राह्मणवाड़ा में भगवान महावीर की "जीवितस्वामी" प्रतिमाएँ होने का तर्क दिया जाता है कि ऐसे मंदिर तभी बन सकते हैं जब भगवान अपने जीवनकाल में स्वयं वहाँ पधारे हों। यह तर्क सुनने में प्रभावशाली लगता है, परंतु "जीवितस्वामी" शब्द के अर्थ को समझ लेने पर यह भ्रम स्वतः दूर हो जाता है।

"जीवितस्वामी" का एक और वास्तविक अभिप्राय है —इससे यह सिद्ध नहीं होता कि जीवितस्वामी का मन्दिर श्री वीरप्रभु की विद्यमानता में बनवाया गया, यह निम्नउद्धरणों से स्पष्ट हो जायगा -



1. जैन धातु प्रतिमा लेख संग्रह भा० प्रथम (आचार्य बुद्धिसागरसूरि जी द्वारा संग्रहीत)

i. संवत १५२२ में प्रतिष्ठित की गई मूर्ति के ऊपर लिखा है:– जीवित स्वामि चन्द्रप्रभ बिंबं (पृष्ठ ७)
ii. संवत १५०३ में प्रतिष्ठित मूर्ति के ऊपर -  जीवित स्वामि श्री नेमिनाथ बिंबं (पृष्ठ १६३)
iii. संवत १५१६ में प्रतिष्ठित मूर्ति के ऊपर -  जीवित स्वामि श्री शान्तिनाथ बिंबं (पृष्ठ १६३)

2. जैन धातु प्रतिमा लेख संग्रह भा० दूसरा (आचार्य बुद्धिसागरसूरि जी द्वारा संग्रहीत)

i. संवत १५५१ में प्रतिष्ठित मूर्ति पर श्री अजितनाथ जीवितस्वामि बिंबं (पृष्ठ ११२)
ii. संवत १५१० में प्रतिष्ठित मूर्ति पर जीवित स्वामि श्री शीतलनाथादि जिनचतुविंशति पट्टः (पृष्ठ ११६)
iii. संवत १४८१ में प्रतिष्ठित मूर्ति पर श्री जीवित स्वामि श्री पार्श्वनाथ बिंबं (पृष्ठ १५२)
iv. संवत १५३१ में प्रतिष्ठित मूर्ति पर श्री जीवित स्वामि श्रीविमलनाथ बिंबं (पृष्ठ १५३)
v. संवत १५३६ में प्रतिष्ठित मूर्ति पर जीवित स्वामि श्री सुमतिनाथ बिंबं (पृष्ठ १६६)
vi. संवत १५०८ में प्रतिष्ठित मूर्ति पर श्री विमल्लनाथ जीवित स्वामि बिंबं (पृष्ठ १७२)
vii. संवत १५१० में प्रतिष्ठित मूर्ति पर जीवित स्वामि श्री शान्तिनाथ बिंबं (पृष्ठ १७३)
viii. संवत १५१९ में प्रतिष्ठित मूर्ति पर जीवित स्वामि श्री 
जितनाथ प्रमुख पंचतीथिं बिंबं (पृष्ठ ६६)

3. प्राचीन लेख संग्रह भाग प्रथम (आचार्य विजयघर्मसूरिजी द्वारा सम्पादित)- संवत १५२० में प्रतिष्ठित मूर्ति पर श्री जीवित स्वामि पंच० श्री निमनाथ बिंबं (पृष्ठ १०२)

4. प्राचीन जैनलेखसंग्रह भाग दूसरा (श्रीजिनविजय जी द्वारा सम्पादित)- संवत १४२६ में वृतिष्ठित मूर्ति पर-  
श्री जीव(वि)त स्वामि श्री महावीरचैत्ये

ये सभी प्रतिमा पाश्चात्य कालीन हैं और
तीर्थंकर तो उन स्थानों पर गए ही नहीं थे, फिर भी उनकी प्रतिमाओं पर यह विशेषण लगाया गया। इससे अत्यंत स्पष्ट हो जाता है कि "जीवितस्वामी" भगवान के जीवनकाल में निर्मित होने का प्रमाण नहीं, बल्कि प्रतिमा की जीवंत कलात्मकता का वर्णन है।

इस संदर्भ में एक और महत्त्वपूर्ण तर्क उठाया जाता है। कहा जाता है कि भगवान के बड़े भाई राजा नंदिवर्धन ने भगवान के जीवनकाल में उनके शरीर के परिमाण के अनुसार, उनके ठीक स्वरूप को देखकर दो प्रतिमाएँ बनवाईं — एक महुवा (भावनगर) में और दूसरी मरुदेश (मारवाड़) में। यही कारण बताया जाता है कि इन्हें "जीवितस्वामी" कहा जाता है। परंतु इस मान्यता में भी गंभीर अंतर्विरोध है।

यदि वास्तव में इन प्रतिमाओं को राजा नंदिवर्धन ने भगवान के जीवनकाल में, उनके सम्मुख बैठकर, उनके यथार्थ स्वरूप के अनुसार बनवाया था — तो क्षत्रियकुंड, नाणा, दियाणा, नांदिया और महुवा में स्थित इन तथाकथित "जीवितस्वामी" प्रतिमाओं की मुखाकृतियाँ आपस में एक-दूसरे से मेल खानी चाहिए थीं। परंतु वास्तविकता इसके विपरीत है — इन प्रतिमाओं की शैली, अनुपात और मुखाकृति एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं। ये मूर्तियाँ स्पष्ट रूप से अलग-अलग काल-खंडों में निर्मित हैं और उनकी कलात्मक भाषाएँ भिन्न हैं। एक ही व्यक्ति के जीवनकाल में, एक ही व्यक्ति की देखरेख में बनी प्रतिमाओं में यह असमानता असंभव होती। यह असमानता स्वयं सिद्ध करती है कि ये प्रतिमाएँ परस्पर असंबद्ध कालों में बनाई गई हैं और नंदिवर्धन-प्रसंग से उनका कोई वास्तविक संबंध नहीं है।

भगवान महावीर की जीवित स्वामी मानी जाने वाली प्रतिमाएँ (Left top to bottom  : क्षत्रियकुण्ड, दियाणा ; right top to bottom : नाणा, नांदिया , महुवा )


प्रश्न ६ - मुण्डस्थल (मूंगथला) का शिलालेख: एक गंभीर परीक्षा

मुण्डस्थल (आबू रोड से लगभग चार मील पश्चिम, आधुनिक नाम मूंगथला) के जैन मंदिर में एक शिलालेख है जिसे भगवान के आबू-भूमि में विचरण का प्रमाण माना जाता है। उस लेख का अर्थ इस प्रकार किया जाता है: "श्री महावीरस्वामी छद्मस्थ अवस्था में आबुदभूमि में विचरे थे; उस समय अर्थात् भगवान के जन्म से ३७वें वर्ष में 'देवा' नामक श्रावक ने यहाँ मंदिर बनवाया, पुण्यपाल राजा ने मूर्ति की प्रतिष्ठा कराई और केशी गणधर ने प्रतिष्ठा की।"

परंतु इस लेख की प्रामाणिकता की परीक्षा करते ही स्थिति स्पष्ट हो जाती है। यह शिलालेख विक्रम संवत् १४२६ का है — अर्थात् भगवान महावीर के निर्वाण के लगभग 1,900 वर्ष बाद का। लेख देवनागरी लिपि में है। यदि यह वास्तव में भगवान के काल का होता तो इसे ब्राह्मी अथवा किसी प्राचीन लिपि में होना चाहिए था। इसी मंदिर के रंगमंडप में संवत् १२१६ का एक पृथक शिलालेख है जो पहली बार इस मंदिर के निर्माण की बात करता है, जिससे सिद्ध होता है कि संवत् १४२६ का लेख जीर्णोद्धार के अवसर पर लिखा गया था।

जब इस शिलालेख की प्राचीनता सिद्ध नहीं होती तो यह तर्क दिया जाता है कि यह किसी प्राचीन लेख की नकल है। परंतु यह मात्र कल्पना है, इसे पुष्ट करने का कोई प्रमाण नहीं। यदि कोई प्राचीन लेख था, तो उसकी नकल मूल लिपि में क्यों नहीं हुई? नए लेख में "यह नकल है" ऐसा स्पष्ट क्यों नहीं लिखा गया? और यदि वह प्राचीन शिलालेख उपलब्ध था, तो उसे सुरक्षित रखने की बजाय नष्ट होने दिया गया — यह कैसे संभव है? इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं है।

श्री महेन्द्रसिंहसूरि की अष्टोत्तरी तीर्थमाला (संवत् १३०० के आसपास) भी भगवान के मुण्डस्थल आगमन का उल्लेख करती है, परंतु उन्होंने स्वयं कोई सबल प्रमाण नहीं दिया — और उनसे भी लगभग १,८०० वर्ष पूर्व की घटना के लिए उनकी किंवदंती-आश्रित स्थापना को प्रमाण नहीं माना जा सकता।


प्रश्न ७ -"लाड देश" का भ्रम: बंगाल या गुजरात?

भगवान महावीर के चौथे और पाँचवें चातुर्मास के बीच "लाड देश" में जाने का उल्लेख मिलता है। इसे आधार बनाकर कुछ लोग गुजरात में भगवान का पधारना सिद्ध करते हैं। परंतु यह "लाड" और "लाट" के बीच का भाषिक भ्रम है।

लाड, भगवान की छद्मस्थ अवस्था में अनार्य प्रदेश गिना जाता था। इसकी राजधानी कोटिवर्ष थी, जिसकी पहचान आज बंगाल के दिनाजपुर जिले के अंतर्गत बानगड से की जाती है — यह सुदूर पूर्व में है, गुजरात में नहीं। दूसरी ओर लाट गुजरात प्रदेश में स्थित था जिसकी राजधानी ईलापुर और बाद में भृगुकच्छ (भरुच) थी। लाट का प्राकृत रूप "लाड" बनता है — और इसी भाषिक समानता के कारण यह भ्रम उत्पन्न हुआ कि भगवान गुजरात गए थे। परंतु लाट (गुजरात) में भगवान के जाने का उल्लेख किसी भी ग्रंथ में नहीं मिलता।

निष्कर्ष

सभी आगम ग्रंथों का विहार-क्रम, नदियों के शास्त्रोक्त वर्णन, भौगोलिक मार्ग की संगति, शिलालेखों की प्रामाणिकता और प्रतिमाओं की कला-शैली का समग्र विश्लेषण एक ही निष्कर्ष पर ले जाता है। गीतार्थ आचार्यों से भी इस विषय पर चर्चा हुई और उनका भी यही मत है कि भगवान महावीर के सभी विहार-स्थल पूर्व भारत में ही थे।

राजस्थान और गुजरात में इन स्थलों को भगवान से जोड़ने के दो संभावित कारण हो सकते हैं। पहला यह कि पूर्व भारत से पश्चिम भारत की ओर जैनों के स्थानांतरण के समय वे अपने साथ पवित्र शिलाएँ और प्रतिमाएँ लेकर आए और नए स्थानों पर उन्हें प्रतिष्ठित कर दिया, जो कालांतर में भगवान के विहार से जोड़ दी गईं। दूसरा यह कि पूर्व भारत के मूल तीर्थों की स्मृति में राजस्थान में बसे जैनों ने उनकी प्रतिकृतियाँ बना लीं — जैसे आज भी अनेक स्थानों पर शत्रुंजय की प्रतिकृति बनाई जाती है।

इन स्थलों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व अपनी जगह है, परंतु उन्हें भगवान महावीर की वास्तविक विहार-भूमि के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यों, शास्त्र और इतिहास — तीनों की दृष्टि से असंगत है। श्रद्धा और इतिहास में अंतर करना जैन परंपरा की बौद्धिक निष्पक्षता की माँग है।

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सन्दर्भ ग्रन्थ
  • तीर्थंकर महावीर (भाग १ और २) - आचार्य श्री विजयेन्द्रसूरी
  • वीर विहार मीमांसा - आचार्य श्री विजयेन्द्रसूरी
  • जैन परम्परा नो इतिहास - पू. श्री दर्शनविजयजी , ज्ञानविजयजी , न्यायविजयजी
  • तीर्थंकर भगवान श्री महावीर ४८ चित्रों का सम्पुट - आचार्य श्री यशोदेवसूरी
  • लार्ड महावीरा एन्ड हिज़ टाइम्स - श्री कैलाश चंद जैन
  • तीर्थंकर भगवान श्री महावीर - आचार्य श्री यशोदेवसूरी
  • श्रमण भगवान महावीर - पंन्यास श्री कल्याणविजयजी गणि
  • प्रभु तमारा पगले पगले - अर्पित शाह
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परिशिष्ठ १ - भगवान श्री महावीर के विहार क्षेत्र और चातुर्मास स्थल

ई. पूर्व

वर्ष

विहार क्रम

चातुर्मास

५६९

कुंडग्राम, ज्ञातखण्ड वन, कुर्मारग्राम, कोल्लागसन्निवेश, मोराकसन्निवेश, दुईञ्जतग आश्रम, अस्थिकग्राम

अस्थिकग्राम

५६८

मोराकसन्निवेश, वाचाला, दक्षिणवाचाला, सुवर्णवालुका (नदी), रूप्यवालुका, कनखल आश्रम, उत्तरवाचाला, श्वेताम्बी, सुरभिपुर, गंगा नदी, थुणांकसन्निवेश, राजगृह, नालन्दासन्निवेश

नालन्दासन्निवेश

५६७

कोल्लाग-सन्निवेश, सुवर्णखल, ब्राह्मणग्राम, चंपानगरी

चंपानगरी

५६६

कालायसन्निवेश, पत्तकालय, कुमाराकसन्निवेश, चोराकसन्निवेश, पृष्ठचंपा

पृष्ठचंपा

५६५

कयंगलासन्निवेश, श्रावस्ती, हलिद्ददुयं, जंगला (नंगला / लांगल), आवत्ता, चोरायसन्निवेश, कलंबुकासन्निवेश, राढ़देश (अनार्य भूमि), पूर्णकलश (अनार्य ग्राम), मलयप्रदेश, भद्दियानगरी

भद्दियानगरी

५६४

कयलीसमांग्राम, जम्बूसंड, तम्बाय-सन्निवेश, वैशाली, ग्रामाकसन्निवेश, शालीशीर्ष, भद्दियानगरी

भद्दियानगरी

५६३

मगधभूमि, आलंभिया

आलंभिया

५६२

कुंडालसन्निवेश, मदनसन्निवेश, बहुसालग, शालवन, लोहार्गला, पुरिमताल, उन्नाग-गोभूमि, राजगृह

राजगृह

५६१

लाढ़, वज्रभूमि और सुम्हभूमि, अनार्यदेश

वज्रभूमि

५६०

१०

सिद्धार्थपुर, कुर्मग्राम, सिद्धार्थपुर, वैशाली, गंडकी नदी, वाणिज्यग्राम, श्रावस्ती

श्रावस्ती

५५९

११

सानुलट्ठिय सन्निवेश, दृढ़भूमि, पोलास-चैत्य, बालुका, सुभोग, सुच्छेता मलय, हत्थिसीस, तोसाली, सिद्धार्थपुर, वज्रगांव, आलंभिया, सेयविया, श्रावस्ती, कोशाम्बी, वाराणसी, राजगृह, मिथिला, वैशाली

वैशाली

५५८

१२

सुंसुमारपुर, भोगपुर, नन्दिग्राम, मेंढ़ियाग्राम, कोशाम्बी, सुमंगल, सुच्छेता, पालक, चंपा

चंपा

५५७

१३

जंभियग्राम, मेढ़िय, छम्माणि, मध्यम अपापा, जंभियग्राम, ऋजुवालुका (नदी) — (केवल्यप्राप्ति)

केवल्यावस्था

 

 

 

५५७

१३

ऋजुवालुका, पावापुरी, राजगृह

राजगृह

५५६

१४

राजगृह, ब्राह्मणकुंड, वैशाली

वैशाली

५५५

१५

वैशाली, कौशांबी, श्रावस्ती, वाणिज्यग्राम

वाणिज्यग्राम

५५४

१६

वाणिज्यग्राम, राजगृह

राजगृह

५५३

१७

राजगृह, चंपा, वीतभय, वाणिज्यग्राम

वाणिज्यग्राम

५५२

१८

वाणिज्यग्राम, वाराणसी, आलंभिया, राजगृह

राजगृह

५५१

१९

राजगृह

राजगृह

५५०

२०

राजगृह, आलंभिया, कौशांबी, वैशाली

वैशाली

५४९

२१

वैशाली, मिथिला, काकंदी, कांपिल्यपुर, पोलासपुर, वाणिज्यग्राम, वैशाली

वैशाली

५४८

२२

वैशाली, राजगृह

राजगृह

५४७

२३

राजगृह, कृतंगला, श्रावस्ती, वाणिज्यग्राम

वाणिज्यग्राम

५४६

२४

वाणिज्यग्राम, ब्राह्मणकुंड, कौशांबी, राजगृह

राजगृह

५४५

२५

राजगृह, चंपा, राजगृह

राजगृह

५४४

२६

राजगृह, काकंदी, मिथिला, चंपा

चंपा

५४३

२७

चंपा, श्रावस्ती, मेढ़ियग्राम, चंपा, मिथिला

मिथिला

५४२

२८

मिथिला, हस्तिनापुर, मोकानगरी, वाणिज्यग्राम

वाणिज्यग्राम

५४१

२९

वाणिज्यग्राम, राजगृह

राजगृह

५४०

३०

राजगृह, पृष्ठचंपा, चंपा, दशार्णपुर, वाणिज्यग्राम

वाणिज्यग्राम

५३९

३१

वाणिज्यग्राम, कांपिल्यपुर, वैशाली

वैशाली

५३८

३२

वैशाली, वाणिज्यग्राम, वैशाली

वैशाली

५३७

३३

वैशाली, राजगृह, चंपा, पृष्ठचंपा, राजगृह

राजगृह

५३६

३४

राजगृह, नालंदा

नालंदा

५३५

३५

नालंदा, वाणिज्यग्राम, वैशाली

वैशाली

५३४

३६

वैशाली, साकेत, वैशाली

वैशाली

५३३

३७

वैशाली, राजगृह

राजगृह

५३२

३८

राजगृह, नालंदा

नालंदा

५३१

३९

नालंदा, मिथिला

मिथिला

५३०

४०

मिथिला

मिथिला

५२९

४१

मिथिला, राजगृह

राजगृह

५२८

४२

राजगृह, अपापापुरी (निर्वाण)

अपापापुरी



परिशिष्ठ 2- भगवान महावीर की विचरण भूमियाँ और उनके वर्तमान स्थल 

1. कुंडग्राम ( ब्राह्मणकुण्ड , क्षत्रियकुण्ड , ज्ञातखण्ड वन) : भगवान महावीर के च्यवन, जन्म और दीक्षा कल्याणक — ये तीनों पवित्र घटनाएँ कुंडग्राम के तीन क्षेत्रों — ब्राह्मणकुण्ड, क्षत्रियकुण्ड और ज्ञातखण्ड वन — में सम्पन्न हुई थीं। श्वेतांबर परंपरा के अनुसार यह स्थान कुंडघाट (क्षत्रियकुंड) है, जो बिहार की जमुई पर्वत श्रृंखला के अंतर्गत लछवाड़ क्षेत्र में स्थित है। दिगंबर परंपरा के एक वर्ग तथा कुछ शोधकर्ताओं के मतानुसार भगवान महावीर का जन्म बासुकुंड (वैशाली, बिहार) में माना जाता है, जबकि दिगंबर परंपरा के ही एक अन्य वर्ग के अनुसार यह जन्मस्थली कुंडलपुर (नालंदा, बिहार) है। (इस विषय का विस्तृत विवरण इसी पुस्तक में 'च्यवन, जन्म और दीक्षा कल्याणक भूमियों के वर्तमान स्थल को लेकर मतभेद' शीर्षक के अंतर्गत दिया गया है।)

2. कुर्मारग्राम - दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात् भगवान महावीर ने तत्काल कुर्मारग्राम की ओर विहार किया। इस स्थान पर एक गोपालक द्वारा उन्हें उपसर्ग पहुँचाया गया, जिसे शक्रेन्द्र ने आकर शांत किया। श्वेतांबर परंपरा के अनुसार यह स्थान बिहार के जमुई जिले में स्थित कुमार गाँव में है, जबकि अन्य मतानुसार यह कमनछपरा (वैशाली, बिहार) में माना जाता है।

3. कोल्लागसन्निवेश: दीक्षा के पश्चात् भगवान महावीर के प्रथम छठ्ठ (दो उपवास) का पारण तथा द्वितीय चातुर्मास के उपरांत किए गए चतुर्थ मासक्षमण का पारण कोल्लाक ग्राम अर्थात् कोल्लागसन्निवेश में सम्पन्न हुआ था। श्वेतांबर परंपरा के अनुसार यह स्थान बिहार के जमुई जिले में स्थित कोनाग गाँव में है, वहीं अन्य मतानुसार इसकी पहचान कोलुहां (वैशाली, बिहार) के रूप में की जाती है।

4. मोराकसन्निवेश: प्रथम चातुर्मास के प्रारंभिक पंद्रह दिनों में भगवान महावीर मोराकसन्निवेश स्थित दुईञ्जतग तापस के आश्रम में स्थिर रहे। श्वेतांबर परंपरा के अनुसार यह स्थान बिहार के जमुई जिले में स्थित मौरा ग्राम में है, वहीं कुछ शोधकर्ताओं के मत से इस स्थान की पहचान झारखंड के देवघर स्थित त्रिकूट पर्वत (त्रिकुट पहाड़ी) से की जाती है।

5. अस्थिकग्राम: चातुर्मास के प्रथम पंद्रह दिन मोराकसन्निवेश में व्यतीत करने के पश्चात् भगवान महावीर विहार करते हुए अस्थिकग्राम पधारे, जहाँ उन्होंने अपना प्रथम चातुर्मास पूर्ण किया। भगवती सूत्र में इस भूमि का नाम "वर्धमान" भी उल्लिखित है। ऐसा वर्णित है कि यहाँ शूलपाणि यक्ष ने अस्थियों का ढेर लगाया था, इसी कारण इस स्थान का नाम "अस्थिकग्राम" पड़ा। इस स्थान पर भगवान महावीर को शूलपाणि यक्ष द्वारा घोर उपसर्ग भी सहना पड़ा। यह स्थान पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले में स्थित बर्ध गाँव के रूप में पहचाना जाता है। अन्य मतानुसार यह स्थान इसी बर्धमान जिले के मंगलकॉट (नूतनहाट) क्षेत्र में स्थित भांगा मस्जिद के आसपास का क्षेत्र माना जाता है।

6. वाचाला: वाचाला, श्वेताम्बी नगरी के समीप स्थित एक प्रमुख नगर था। उत्तर और दक्षिण — इन दो भागों में विभक्त होने के कारण यह क्रमशः उत्तर वाचाला सन्निवेश और दक्षिण वाचाला सन्निवेश के नाम से प्रसिद्ध था। इन दोनों सन्निवेशों के मध्य सुवर्णबालुका और रूप्यवालुका नाम की दो नदियाँ प्रवाहित होती थीं। भगवान महावीर दक्षिण वाचाला से उत्तर वाचाला की ओर जा रहे थे, उसी समय दीक्षा के समय का आधा देवदूष्य सुवर्णबालुका नदी के किनारे कंटकों में फँसकर गिर पड़ा। भगवान ने उसकी ओर एक दृष्टि डाली और आगे बढ़ गए — तभी से वे यावज्जीवन अचेलक रहे। वर्तमान में इस स्थल की पहचान पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में डेउचा और बोलपुर के मध्य स्थित क्षेत्र के रूप में की जाती है।

7. कनखल / कनकखल आश्रम: उत्तर वाचाला जाने के लिए दो मार्ग प्रचलित थे — एक कनकखल आश्रम के भीतर से होकर जाता था, जबकि दूसरा आश्रम के बाहर से। आश्रम के भीतर का मार्ग अपेक्षाकृत सीधा अवश्य था, किंतु अत्यंत निर्जन और भयावह था; इसके विपरीत, आश्रम के बाहर का मार्ग लंबा होने पर भी सुरक्षित होने के कारण मुख्य पथ के रूप में उपयोग में आता था। इसी क्षेत्र में चंडकौशिक नामक दृष्टिविष सर्प द्वारा भगवान महावीर को उपसर्ग सहना पड़ा था। वर्तमान में इस स्थल की पहचान पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित जोगी पहाड़ी (उषका गाँव) के रूप में की जाती है।

8. श्वेताम्बी / श्वेताम्बिका: वाचाला के समीप स्थित इस नगरी के राजा प्रदेशी ने भगवान महावीर का अत्यंत श्रद्धापूर्वक स्वागत किया। प्रभु के प्रति अपनी भक्ति और सम्मान प्रकट करते हुए उन्होंने अपने राज्य "वज्रभूमि" का नाम परिवर्तित कर "वीरभूमि" रख दिया। वर्तमान में इस स्थल की पहचान पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के सैंथिया नगर के रूप में की जाती है।

9. सुरभिपुर: श्वेताम्बी नगरी से भगवान महावीर ने सुरभिपुर की ओर विहार किया। मार्ग में उन्हें रथों पर आरूढ़ पाँच नैयक राजाओं का समूह मिला, जिन्होंने विनम्रतापूर्वक प्रभु की वंदना की। यह स्थल वर्तमान में पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के बीरचन्द्रपुर से संबद्ध माना जाता है। आगे विहार करते हुए भगवान महावीर सुरभिपुर पहुँचे, जहाँ से उन्होंने नौका द्वारा गंगा नदी को पार किया। इस प्रसंग में सुदंष्ट्र (अथवा सुदाढ़) देव द्वारा प्रभु को उपसर्ग किया गया, जिसे उन्होंने पूर्ण समभाव से सहन किया। वर्तमान में सुरभिपुर की पहचान पश्चिम बंगाल में राजग्राम के समीप स्थित नीमतिता से की जाती है।

10. थुणांकसन्निवेश: गंगा नदी में नौका द्वारा विहार के पश्चात् प्रभु थुणांकसन्निवेश पधारे। यह स्थान संभवतः वर्तमान बिहार राज्य के बख्त्यारपुर के समीप गंगा नदी के तट पर स्थित है।

11. राजगृह: प्राचीनकाल में मगध देश की यह गौरवशाली राजधानी थी। भगवान महावीर ने यहाँ सर्वाधिक — कुल दस — चातुर्मास सम्पन्न किए (क्रमांक ८, १३, १६, १८, १९, २२, २४, ३३, ३७ एवं ४१)। यहाँ श्री मुनिसुव्रत स्वामी भगवान के ४ कल्याणक हुए हैं। यह नगर वर्तमान बिहार में राजगिर के नाम से प्रसिद्ध है।

12. नालन्दासन्निवेश: थुणांकसन्निवेश से ग्रामानुग्राम विहार करते हुए भगवान महावीर राजगृह के बाहर नालंदासन्निवेश में ठहरे। वहाँ भगवान एक तंतुवायशाला (बुनकर के कारखाने) में रुके तथा उसके स्वामी से अनुमति लेकर उस शाला के एक कोने में चातुर्मास किया। मासक्षमण करके भगवान ध्यान में स्थिर हो गए। उसी अवसर पर मंखली-पुत्र गोशाला की भगवान से प्रथम भेंट हुई। यहाँ कुल तीन चातुर्मास (क्रमांक २, ३४ एवं ३८) सम्पन्न हुए। वर्तमान में यह स्थान बिहार राज्य के राजगीर के समीप नालंदा में स्थित है।

13. सुवर्णखल: चातुर्मास समाप्त होते ही भगवान ने नालंदा से विहार किया और कोल्लागसन्निवेश में जाकर बहुल ब्राह्मण के यहाँ मासक्षमण का पारणा किया। तत्पश्चात् गोशाला के साथ भगवान ने सुवर्णखल की ओर विहार किया। वर्तमान में यह स्थान बिहार राज्य के सोनखर गाँव में स्थित है।

14. ब्राह्मणग्राम: यह ग्राम राजगृह से चम्पा जाने वाले मार्ग पर स्थित था। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

15. चंपानगरी: प्राचीनकाल में यह अंग देश की राजधानी थी। चंपा नगरी का उपनगर पृष्ठचम्पा था। भगवान महावीर ने यहाँ दो चातुर्मास (क्रमांक ३ एवं १२) तथा पृष्ठचम्पा में एक चातुर्मास (क्रमांक ४) सम्पन्न किया। वर्तमान बिहार राज्य के भागलपुर के निकट पूर्व में स्थित चम्पानगर ही प्राचीन चम्पा है; इसके निकट ही चम्पा नाम की नदी प्रवाहित होती है। यह पवित्र भूमि वासुपूज्य भगवान के पाँचों कल्याणकों की भी साक्षी रही है।

16. कालाय सन्निवेश: चंपानगरी से विहार करके प्रभु महावीर कालाय सन्निवेश पधारे। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

17. पत्तकालय: कालायसन्निवेश से विहार करके प्रभु महावीर पत्तकालय (पत्रकाल) नामक ग्राम में पधारे। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

18. कुमाराकसन्निवेश: पत्तकालय से विहार करके प्रभु महावीर कुमाराकसन्निवेश पधारे, जहाँ गोशाला ने पार्श्वनाथ भगवान की परंपरा के मुनियों का अपमान किया। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

19. चोराकसन्निवेश: कुमाराकसन्निवेश से गोशाला के साथ भगवान चोराकसन्निवेश पधारे। इस ग्राम में चोरों का भय होने से पहरेदार अत्यंत सतर्क रहते थे और किसी अपरिचित को प्रवेश नहीं करने देते थे। जब भगवान ग्राम में पहुँचे तो पहरेदारों ने उनसे परिचय माँगा; किंतु भगवान ने कोई उत्तर नहीं दिया। पहरेदारों ने उन्हें गुप्तचर समझकर बंदी बना लिया और भगवान तथा गोशाला — दोनों को बहुत कष्ट दिया। तब उत्पल नैमित्तिक की बहनें सोमा और जयन्ती — जो संयम पालन में असमर्थ होने के कारण परिव्राजिकाएँ बन गई थीं और उसी ग्राम में निवास करती थीं — घटनास्थल पर आईं और पहरेदारों को भगवान का परिचय कराया। परिचय पाकर पहरेदारों ने भगवान को मुक्त किया और उनसे क्षमायाचना की। वर्तमान में यह स्थल झारखंड के चोरैया गाँव में स्थित है।

20. कयंगलासन्निवेश: चोराकसन्निवेश से विहार करके प्रभु पृष्ठचम्पा पधारे जहाँ उन्होंने चातुर्मास किया। चातुर्मास के पश्चात् प्रभु कयंगलासन्निवेश (कृतमंगल सन्निवेश) पधारे। कयंगला, मध्यदेश की पूर्वी सीमा पर स्थित था। वर्तमान में यह स्थान राजमहल, साहिबगंज (झारखंड) में है।

21. सावत्थी (श्रावस्ती): कयंगलासन्निवेश से भगवान ने श्रावस्ती की ओर विहार किया। प्राचीनकाल में यह कोशल देश की राजधानी थी तथा साकेत (अयोध्या) से ६ योजन और राजगृह से उत्तर-पश्चिम में ४५ योजन की दूरी पर स्थित थी। भगवान महावीर ने यहाँ एक चातुर्मास (क्रमांक १०) सम्पन्न किया। भगवन के केवलज्ञान के बाद गोशालक द्वारा तेजोलेश्या का उपसर्ग भी यहीं हुआ था। वर्तमान उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती का सहेत-महेत क्षेत्र ही प्राचीन श्रावस्ती का स्थान है। यह भूमि सम्भवनाथ भगवान के चार कल्याणकों से भी पावन है।

22. हलिद्ददुयं: श्रावस्ती से भगवान हल्लिदुय ग्राम की ओर विहार किए। उस नगर से बाहर हलिग नामक एक विशाल वृक्ष था, जिसके नीचे भगवान कायोत्सर्ग में स्थिर हो गए; गोशाला भी साथ था। पास ही ठहरे एक व्यापारी कारवाँ ने रात्रि में शीत से बचने हेतु अग्नि जलाई। प्रातः काल कारवाँ के जाने के पश्चात् वह अग्नि बढ़ते-बढ़ते भगवान के समीप आ पहुँची। गोशाला ने प्रभु को सचेत करके स्वयं तो वहाँ से चला गया, किंतु भगवान महावीर ध्यान में ही स्थिर रहे और उनके चरण अग्नि से दग्ध हो गए। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

23. नंगला / लांगल: यह स्थान कोशल देश (अयोध्या के समीप) में था और बौद्ध साहित्य में इच्छानंगल नाम से प्रसिद्ध है। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

24. आवत्ता (आवर्त): इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

25. चोरायसन्निवेश: आवर्त से भगवान चोराय-सन्निवेश पधारे और वहाँ भी एकांत में ध्यान में निमग्न हो गए। यहाँ गोशाला जब गोचरी के लिए जा रहा था, तो ग्रामवासियों ने उसे गुप्तचर समझकर बंदी बना लिया और दंडित किया। वर्तमान में यह स्थल उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में स्थित चौरा-चोरी गाँव में है।

26. कलंबुकासन्निवेश: चोराय-सन्निवेश से भगवान कलंबुका-सन्निवेश पधारे, जहाँ कालाहस्ती ने प्रभु श्री वीर और गोशाला दोनों को बंदी बना लिया था। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

27. राढ़देश (अनार्य भूमि) — पूर्णकलश (अनार्य ग्राम): इस क्षेत्र में प्रभु पर अनेक कठोर उपसर्ग हुए। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका तथा हिंदू, बौद्ध और जैन ग्रंथों के आधार पर यह राढ़ क्षेत्र वर्तमान के बंगाल, बिहार और झारखंड राज्यों में विस्तृत था। यह प्रदेश गंगा के पश्चिम में बंगाल का वह भाग था जिसमें आजकल के तामलुक, मिदनापुर, हुगली और बर्दवान जिले सम्मिलित थे; मुर्शिदाबाद जिले का कुछ भाग इसकी उत्तरी सीमा में था। इस क्षेत्र की राजधानी कोटिवर्ष थी, जो आधुनिक बानगढ़ है। इसके दो भाग थे — उत्तरराढ़ और दक्षिणराढ़, और दोनों के बीच अजया नदी प्रवाहित होती थी। यह गुजरात के लाट देश से सर्वथा भिन्न प्रदेश है।

28. मलयप्रदेश: इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

29. भद्दियानगरी: यहाँ कुल दो चातुर्मास (क्रमांक ५ एवं ६) सम्पन्न हुए। यह स्थान वर्तमान झारखंड के हंटरगंज जिले के भोंडल गाँव में अवस्थित है। यह पावन भूमि शीतलनाथ भगवान के चार कल्याणकों से भी मंडित है।

30. कयलीसमांग्राम: इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

31. जम्बूसंड: यह गाँव वैशाली से कुशीनारा जाने वाले मार्ग पर अम्बगाँव और भोगनगर के बीच में था और वैशाली से चौथा पड़ाव था। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

32. तम्बाय-सन्निवेश: इस ग्राम में पार्श्वनाथ संतानीय नन्दिसेण नाम के बहुश्रुत साधु निवास करते थे, जिन्होंने गच्छ की चिंता का भार अपने शिष्यों को सौंपकर जिनकल्पी आचार पालन और ध्यान-साधना में स्वयं को समर्पित कर दिया था। गोशाला ग्राम में गया और उनके शिष्यों से विवाद करके भगवान के पास लौट आया। उस रात नन्दिसेण साधु चौराहे पर खड़े होकर ध्यान कर रहे थे, तब एक आरक्षक-पुत्र ने उन्हें चोर समझकर भाले से मार डाला। उसी क्षण उन्हें अवधिज्ञान प्राप्त हुआ और मृत्यु के पश्चात् वे देवलोक को गए। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

33. कूपिय-सन्निवेश: यहाँ ग्रामवासियों ने भगवान को गुप्तचर समझकर बंदी बना लिया और उन्हें बहुत कष्ट दिया। भगवान ने उनके प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया। तब पार्श्वनाथ संतानीय विजया और प्रगल्भा नाम की साध्वियों को सूचना मिली और वे वहाँ पहुँचीं। साध्वियों ने पहरेदारों से कहा — "क्या तुम राजा सिद्धार्थ के पुत्र धर्मचक्रवर्ती भगवान महावीर को नहीं पहचानते? यदि इन्द्र को तुम्हारे दुष्कार्य का ज्ञान हुआ तो तुम्हारी क्या दशा होगी? इन्हें तत्काल मुक्त करो।" परिचय पाकर सभी पश्चाताप करने लगे और भगवान से क्षमायाचना की। यह स्थान उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की खलीलाबाद तहसील में, खलीलाबाद-मेंहदावल सड़क के सातवें मील पर स्थित है; बस्ती शहर से यह लगभग ३१ मील की दूरी पर है।

34. वैशाली: कूपिय-सन्निवेश से भगवान ने वैशाली की ओर विहार किया। यहाँ पर गोशाला पहली बार प्रभु श्री वीर से पृथक् हुआ; इसी स्थान पर शक्रेन्द्र ने एक लोहार को भगवान पर उपसर्ग करने से रोका। भगवान महावीर ने यहाँ कुल सात चातुर्मास (क्रमांक ११, १४, २०, २९, ३१, ३२ एवं ३५) सम्पन्न किए। वर्तमान बसाढ़ (वैशाली जिला, बिहार) ही प्राचीन वैशाली है, जो पटना से उत्तर की ओर लगभग ६० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

35. ग्रामाकसन्निवेश: इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

36. शालीशीर्ष: यहाँ कटपुटना देवी द्वारा प्रभु श्री वीर पर उपसर्ग किया गया था। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

37. मगधभूमि: भगवान महावीर के समय में मगध की पूर्वी सीमा चम्पा नदी, दक्षिण में विन्ध्य पर्वत, पश्चिम में सोम नदी और उत्तर में गंगा नदी थी। इस देश की राजधानी राजगृह (वर्तमान राजगिर) थी।

38. आलंभिया: यह स्थान सावत्थी (श्रावस्ती) से राजगृह जाने वाले मार्ग पर, श्रावस्ती से ३० योजन और बनारस से संभवतः १२ योजन की दूरी पर था। बौद्ध साहित्य में इसे आलवी लिखा गया है। भगवान महावीर ने यहाँ एक चातुर्मास (क्रमांक ७) सम्पन्न किया। विद्वानों कनिंघम और हार्नल के मतानुसार उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का नवलगाँव ही प्राचीन आलभिका है।

39. कुंडालसन्निवेश / कुंडाकसन्निवेश: इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

40. मदनसन्निवेश: वर्तमान उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के मर्दनपुर गाँव में यह स्थान अवस्थित है।

41. बहुसालग (शालवन): यहाँ शालार्य नामक व्यंतरी ने भगवान पर अनेक उपसर्ग किए; किंतु अंततः थककर वह अपने स्थान को लौट गई। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

42. लोहार्गला: यहाँ जितशत्रु राजा के सैनिकों ने प्रभु तथा गोशाला को शत्रुपक्ष का गुप्तचर समझकर बंदी बना लिया था। वर्तमान में यह स्थान झारखंड के लोहारडागा में स्थित है।

43. पुरिमताल: जैन ग्रंथों में प्रयाग का प्राचीन नाम पुरिमताल मिलता है। यहीं वटवृक्ष के नीचे शकटमुख नामक उद्यान में भगवान ऋषभदेव को केवलज्ञान और केवलदर्शन प्राप्त हुए थे। पुरिमताल नगर में वग्गुर नामक श्रेष्ठी और उनकी पत्नी भद्रा निवास करते थे, जिन्हें संतान नहीं थी। एक दिन वग्गुर शकटमुख उद्यान में भ्रमण करते हुए एक प्राचीन मंदिर में पहुँचे जहाँ भगवान मल्लिनाथ की प्रतिमा विराजमान थी। वहाँ उन्होंने संकल्प किया कि यदि संतान प्राप्त हो तो वे मल्लिनाथ भगवान का मंदिर बनवाएँगे। कालांतर में भद्रा को गर्भ प्राप्त हुआ। उसी दिन से उन्होंने मंदिर निर्माण प्रारंभ किया और भगवान की नित्य पूजा में संलग्न हो गए। समय आने पर पुत्र प्राप्त हुआ। प्रसन्नचित्त होकर दोनों पूजार्थ निकले, तभी विहार करते हुए भगवान महावीर भी उसी उद्यान में पधारे और ध्यान में लीन हो गए। ईशान देवेन्द्र अपने दिव्य वैभव सहित भगवान के दर्शनार्थ आए, और वंदन कर लौटते समय वग्गुर सेठ को देखकर बोले — "क्या तुम प्रत्यक्ष तीर्थंकर को न जानते हुए केवल प्रतिमा की पूजा कर रहे हो?" यह सुनकर वग्गुर सेठ तत्काल वहाँ आए और "मिच्छामि दुक्कड़म्" कहकर भगवान महावीर की भक्तिपूर्वक अर्चना की। वर्तमान में उत्तर प्रदेश का प्रयागराज (इलाहाबाद) ही प्राचीन पुरिमताल का स्थान है।

44. उन्नाग-गोभूमि: पुरिमताल से भगवान उन्नाग और गोभूमि होते हुए राजगृह पहुँचे, जहाँ उन्होंने आठवाँ चातुर्मास (क्रमांक ८) सम्पन्न किया। इस वर्षवास में उन्होंने चातुर्मासिक तप और विविध योग-क्रियाओं की साधना की। चातुर्मास समाप्त होने पर विहार करके भगवान ने बाहर जाकर तप का पारणा किया। तत्पश्चात् उनके मन में यह विचार उठा — "अब भी अनेक क्लिष्ट कर्म आत्मा पर अवशिष्ट हैं। उन्हें शीघ्र नष्ट करने हेतु पुनः अनार्य देश में विचरण करना उचित है, क्योंकि यहाँ के लोग मुझे पहचानते हैं, जिससे कर्म-निर्जरा में विलंब हो रहा है।" ऐसा विचार करके उन्होंने राढ़ देश की वज्रभूमि और सुम्हभूमि में पुनः विचरण प्रारंभ किया। उन्नाग-गोभूमि का वर्तमान अभिज्ञान अनुपलब्ध है।

45. लाढ़ देश — वज्रभूमि – सुम्हभूमि – अनार्यदेश: शास्त्रों में भगवान के लाढ़ देश में आगमन को कुछ विद्वान् अर्बुद देश का विहार मानते हैं और इस लाढ़ अथवा राढ़ की समता लाट-देश से करते हैं; किंतु यह मत भ्रमपूर्ण है। लाढ़ अथवा राढ़ देश की राजधानी कोटिवर्ष थी। राढ़, बंगाल का वह भाग है जो गंगा के पश्चिम में स्थित है और जिसमें तामलुक, मिदनापुर, हुगली और बर्दवान जिले सम्मिलित थे; मुर्शिदाबाद जिले का कुछ भाग उसकी उत्तरी सीमा में था। जैन परंपरा के अनुसार इसके वज्रभूमि और सुम्हभूमि — ये दो विभाग थे। लाढ़ का प्रमुख नगर कोटिवर्ष था, जो दिनाजपुर जिले में स्थित बानगढ़ है। तदनंतर वज्रभूमि के प्रदेशी राजा ने प्रभु के आगमन के उपलक्ष्य में वज्रभूमि का नाम वीरभूमि रख दिया, जो आज पश्चिम बंगाल में बीरभूम के नाम से विख्यात है।

46. वाणिज्यग्राम: वैशाली और वाणिज्यग्राम के बीच गंडकी नदी प्रवाहित होती थी। यह वैशाली का उपनगर था, जहाँ भगवान महावीर ने छह चातुर्मास (क्रमांक १५, १७, २१, २३, २८ एवं ३०) सम्पन्न किए। वर्तमान में यह स्थान वैशाली जिले के बनियागाँव में स्थित है।

47. सानुलट्ठिय सन्निवेश: दसवाँ चातुर्मास समाप्त होते ही भगवान ने श्रावस्ती से सानुलट्ठिय सन्निवेश की ओर विहार किया। यहाँ भगवान 'भद्र', 'महाभद्र' और 'सर्वतोभद्र' प्रतिमाओं की आराधना करते हुए ध्यानमग्न रहे और अविच्छिन्न सोलह उपवास किए। तप का पारणा करने के लिए भगवान आनन्द गृहपति के घर पधारे। वहाँ बहुला नामक दासी रसोई में बर्तन साफ कर रही थी और शेष ठंडा अन्न फेंकने जा रही थी। तभी भगवान वहाँ पहुँचे। दासी ने पूछा — "महाराज, आपको क्या चाहिए?" भगवान ने दोनों हाथ पसारे और दासी ने बड़ी भक्ति से वह अन्न उनके हाथों पर रख दिया। भगवान ने उस शेष अन्न से ही पारणा किया। इस स्थान के झारखंड के सिंघभूम जिले में होने की संभावना व्यक्त की जाती है।

48. सिद्धार्थपुर: भगवान के साथ विचरते हुए गोशाला ने यहाँ नियतिवाद का विपरीत प्ररूपण किया। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान आंध्र प्रदेश के सिद्धांतम (श्रीकुर्मम) के समीप माना जाता है।

49. कुर्मग्राम: भगवान के साथ विचरते हुए गोशाला ने यहाँ भगवान से तेजोलेश्या की विधि सीखी। कालांतर में इस स्थान का नाम कंगोड़ा हुआ। कंगोड़ा (अथवा कोंगोड़ा) ओडिशा के वर्तमान गंजाम, खोरधा और पुरी जिलों में विस्तृत एक प्राचीन भौगोलिक एवं राजनीतिक क्षेत्र था।

50. दृढ़भूमि — पेढ़ाल गाँव — पोलास-चैत्य: यहाँ संगम देव ने प्रभु पर घनघोर उपसर्ग किए थे। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

51. बालुका: इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

52. सुभोग / सुभोम: यह प्राचीन कलिंग का सुवर्णपुर था। वर्तमान में यह ओडिशा के सोनपुर (बलांगीर जिले) में स्थित है।

53. सुच्छेता: यह प्राचीन कलिंग के कोशल का उत्तर-पश्चिम भाग था। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

54. मलय: वर्तमान ओडिशा के ढेंकानाल जिले में पल्लहरा के समीप स्थित मलयगिरि में यह स्थान अवस्थित है।

55. हत्थिसीस: यह प्राचीन कलिंग का एक भाग था। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

56. तोसाली: यहाँ के लोगों ने भगवान को चोर समझकर उपद्रव किया। वर्तमान में यह स्थान ओडिशा के भुवनेश्वर शहर के सिसुपालगढ़-धौली विस्तार में स्थित है।

57. मोसाली: यह प्राचीन कलिंग का एक भाग था। यहाँ भी प्रभु पर चोर होने का आरोप लगाया गया। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम् और कलिंगपट्टनम के समीप माना जाता है।

58. वज्रगाँव: संगम के उपसर्गों के कारण भगवान के छह माह के उपवास का पारणा यहाँ वत्सपालिका ग्वालिन द्वारा सम्पन्न कराया गया। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

59. सेयविया: व्रजगाम से भगवान ने श्रावस्ती की ओर विहार किया और आलंभिया, सेयविया आदि प्रसिद्ध नगरों में होते हुए श्रावस्ती पहुँचे। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

60. कोशाम्बी: यह वत्स देश की राजधानी थी। प्रभु ने यहाँ अनेक बार विचरण किया। बारहवें चातुर्मास (क्रमांक १२) में चंदनबाला द्वारा प्रभु का पारणा यहीं सम्पन्न हुआ था। वर्तमान में यह स्थान उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के समीप कौशाम्बी में स्थित है।

61. वाराणसी: यह काशी देश की प्राचीन राजधानी थी। यहाँ श्री पार्श्वनाथ भगवान के ४ कल्याणक (भेलूपुर) और श्री सुपार्श्वनाथ भगवान के ४ कल्याणक (भदैनी) में हुए थे। वर्तमान में उत्तर प्रदेश की वाराणसी (बनारस) नगरी ही यह स्थान है।

62. मिथिला: प्राचीनकाल में यह विदेह देश की राजधानी थी और चम्पा से १६ योजन की दूरी पर स्थित थी। भगवान महावीर ने यहाँ कुल छह चातुर्मास (क्रमांक २५, २६, २७, ३६, ३९ एवं ४०) सम्पन्न किए। यह पावन भूमि मल्लिनाथ भगवान और नमिनाथ भगवान के चार-चार कल्याणकों से भी अनुग्रहीत है। वर्तमान में यह स्थान बिहार के सीतामढ़ी और नेपाल के जनकपुर जिले में अवस्थित है।

63. सुंसुमारपुर: यह भग्ग (भंगी) देश की राजधानी थी और भग्गदेश, वैशाली और श्रावस्ती के मध्य में स्थित था। वर्तमान में यह स्थान उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले के चुनार गाँव में अवस्थित है।

64. भोगपुर: बौद्ध ग्रंथकारों ने इस स्थान को "भोगनगर" कहा है। यह वैशाली से कुशीनारा जाने वाले मार्ग पर पाँचवाँ पड़ाव था। वर्तमान में यह स्थान उत्तर प्रदेश के बादुरवा क्षेत्र के बढ़ीवा पोखरा, बदुराओं (होला वंतैल) में स्थित माना जाता है।

65. नन्दिग्राम: इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

66. मेंढ़ियाग्राम: यहाँ एक गोपालक ने भगवान को कष्ट देने की चेष्टा की। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

67. सुमंगल: यहाँ सनत्कुमार इन्द्र ने प्रभु को वंदना की। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

68. पालक: यहाँ भयाल वणिक ने उपसर्ग किया, जिसे सिद्धार्थ व्यंतर ने निवारित किया। इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

69. छम्माणि: यह स्थान चंपा और पावा के मध्य में था। यहाँ एक ग्वाले ने भगवान के दोनों कानों में काश नामक घास की नुकीली शलाकाएँ ठोंक दीं — प्रचलित परंपरा में यह घटना "खील ठोकने का उपसर्ग" कहलाती है। वर्तमान में यह स्थान बिहार शरीफ के बाह्य क्षेत्र के छमन गाँव में है।

70. मध्यम अपापा (अपापापुरी): ग्वाले द्वारा किए गए इस कील-ठोंकने वाले उपसर्ग का निवारण पावा में सिद्धार्थ वणिक और खरक वैद्य ने शलाकाएँ निकालकर किया। प्रभु अनेक बार पावा पधारे — यहीं शासन की स्थापना हुई और निर्वाण कल्याणक भी इसी पावन स्थल पर सम्पन्न हुआ। यहाँ प्रभु का अंतिम चातुर्मास (क्रमांक ४२) भी हुआ। यह मध्यदेश की पावापुरी है, जो मल्लदेश की पावापुरी से भिन्न है। प्राचीनकाल में तीन पावा नगरियाँ मानी जाती थीं — एक मल्लों की, दूसरी मंगों (मगध) की राजधानी, और तीसरी मध्यम पावा। वर्तमान में यह स्थान बिहार की पावापुरी में है। कुछ शोधकर्ता इसे उत्तर प्रदेश के पडरौना में मानते हैं। (इस विषय का विस्तृत विवरण इसी पुस्तक में 'निर्वाण कल्याणक के वर्तमान स्थल को लेकर मतभेद' शीर्षक के अंतर्गत दिया गया है।)

71. जंभियग्राम: पावा से प्रभु जंभियग्राम की ओर विहार किए। वहाँ ऋजुवालिका (उलुवइया / उजुवालिया) नदी के तट पर, शालवृक्षों के वन में, गौदोहिका आसन में विराजमान होकर उन्हें केवलज्ञान और केवलदर्शन की प्राप्ति हुई। इस स्थल को लेकर परंपराओं में मतभेद है — श्वेतांबर परंपरा इसे झारखंड में बराकर नदी के किनारे स्थित जमक कटवालडीह मानती है, जबकि दिगंबर परंपरा इसे बिहार के जमुई में ऊलाई नदी के तट पर स्थित मानती है। (इस विषय का विस्तृत विवरण इसी पुस्तक में 'केवलज्ञान कल्याणक के वर्तमान स्थल को लेकर मतभेद' शीर्षक के अंतर्गत दिया गया है।)

72. वीतभय: इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

73. साकेत: भगवान महावीर ने यहाँ कोटिवर्ष के राजा चिलात को दीक्षा प्रदान की। यहाँ कुल उन्नीस कल्याणक सम्पन्न हुए — श्री आदिनाथ भगवान के ३ कल्याणक तथा श्री अजितनाथ, अभिनन्दन स्वामी, सुमतिनाथ और अनंतनाथ भगवान के ४-४ कल्याणक यहाँ हुए। इसका वर्तमान स्थल उत्तर प्रदेश का अयोध्या नगर है।

74. काकंदी: काकंदी नगर के बाहर प्रभु श्री वीर का समवसरण रचा गया। यह भूमि श्री सुविधिनाथ प्रभु के चारों कल्याणकों से पावन है। वर्तमान में यह स्थान बिहार के जमुई जिले के काकन गाँव में स्थित है।

75. कांपिल्यपुर: यहाँ श्री महावीर स्वामी का समवसरण रचा गया था। उस अवसर पर बारह व्रतधारी श्रावक कुंडकौलिक ने 'आजीवक' मत के एक देव को वाद में पराजित किया, जिसका उल्लेख प्रभु महावीर ने स्वयं अपनी देशना में किया। यह तेरहवें तीर्थंकर श्री विमलनाथ प्रभु के च्यवन, जन्म, दीक्षा और केवलज्ञान — इन चारों कल्याणकों की पावन भूमि है। वर्तमान में यह स्थान उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में कंपिल नाम से प्रसिद्ध है।

76. पोलासपुर: वर्तमान में यह स्थान ओडिशा के गंजाम जिले के पलासपुर गांव में स्थित हैं

77. कृतंगला: इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

78. हस्तिनापुर: भगवान महावीर ने इस नगर में पोट्टील और शिवराज को दीक्षा प्रदान की। यह भूमि कुल बारह कल्याणकों से पावन है — श्री शान्तिनाथ, श्री कुन्थुनाथ और श्री अरनाथ भगवान के च्यवन, जन्म, दीक्षा और केवलज्ञान कल्याणक यहाँ सम्पन्न हुए। भगवान ऋषभदेव के वर्षीतप का पारणा भी यहीं हुआ था। वर्तमान में यह स्थान उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर से लगभग ३७ किलोमीटर दूर हस्तिनापुर में है।

79. मोकानगरी: इस स्थान का वर्तमान अभिज्ञान अभी तक अनुपलब्ध है।

80. दशार्णपुर: यह दशार्णभद्र राजा की राजधानी थी और भगवान महावीर की अठारहवीं केवलज्ञान यात्रा के दौरान उनके पदार्पण का साक्षी बना। दशार्ण देश का यह प्रमुख केंद्र वर्तमान मध्य प्रदेश के विदिशा के आसपास का क्षेत्र माना जाता है।

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